Thursday, February 26, 2026
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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में संविधान दिवस कार्यक्रम का किया गया आयोजन

“भारत का संविधान एक जीवंत रूपरेखा है, जो हमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गारंटी देता है।”

  • – न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा मुख्य न्यायाधीश छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
  • संविधान दिवस के अवसर में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर स्थित Unity Hall Auditorium में गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम “संविधान दिवस 2025 हमारे लोकतांत्रिक आदर्शों का पुनः संकल्प” (Constitution Day 2025: Reaffirming Our Democratic Ideals) विषय पर आधारित था, जिसमें न्यायपालिका की संवैधानिक मूल्यों, न्याय एवं लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित किया गया।

मुख्य अतिथि के रूप में न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा, मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के द्वारा राष्ट्रीय गान के पश्चात, ज्ञान एवं प्रकाश के प्रतीक दीप प्रज्वलन ने साथ कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया गया।

न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा, मुख्य न्यायाधीश छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, के द्वारा अपने प्रेरणादायक उद्बोधन में संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता तथा भारतीय लोकतंत्र के निर्माण में संवैधानिक मूल्यों के निर्णायक भूमिका को प्रकाशित करते हुए कहा गया कि संविधान न केवल राज्य की संरचना निर्धारित करता है बल्कि समय-समय पर बदलती परिस्थितियों में राष्ट्र को मार्गदर्शन प्रदान करता है, प्रत्येक नागरिक की गरिमा और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है। भारत का संविधान एक जीवंत रूपरेखा है, जो हमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गारंटी देता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल संविधान में नहीं, बल्कि उसके प्रभावी पालन में निहित है, भारतीय संदर्भ में संवैधानिकता कोई अमूर्त सिद्धांत नहीं है, यह प्रत्येक नागरिक के दैनिक जीवन को प्रभावित करती है। संविधान का अनुच्छेद 21 “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के अधिकार की रक्षा करता है, जिसे न्यायपालिका ने गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार के रूप में विस्तारित किया है। इसमें भोजन, स्वच्छ पेयजल, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य तथा स्वच्छ पर्यावरण जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ सम्मिलित हैं, जो शासन को मानवीय, उत्तरदायी और कमजोर वर्गों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाती हैं। संवैधानिकता राज्य की शक्ति को सीमित करती है तथा यह सुनिश्चित करती है कि उसका उपयोग जिम्मेदारी, सावधानी और मौलिक अधिकारों के सम्मान के साथ हो। न्यायपालिका सतत् यह अभिव्यक्त करती आई है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा किसी कठोर, यांत्रिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि मानवीय, संतुलित और संविधान-सम्मत तरीके से होनी चाहिए। दंड प्रक्रिया और आपराधिक न्याय व्यवस्था भी इन्हीं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित रहनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधिपति महोदय ने न्याय वितरण प्रणाली की भूमिका पर बल देते हुए समस्त संबंधित पक्षों से आह्वान किया कि संविधान में निहित सिद्धांतों को केवल व्याख्यायित ही न करें, बल्कि उन्हें अपने कार्यों में सक्रिय रूप से लागू भी करें। प्रत्येक न्यायिक निर्णय एवं प्रशासनिक कार्यवाही में लोकतांत्रिक आदर्शों, निष्पक्षता, समानता और मानव गरिमा की पुनः पुष्टि होती रहनी चाहिए, अन्त में उन्होंने सभी उपस्थित जनों से आग्रह किया कि संविधान में निहित लोकतांत्रिक मूल्यों को अपने आचरण और कार्य में दृढ़ता से अपनाए, ताकि हमारा संविधान सदैव हमारे गणराज्य का मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ बना रहे।
उपरोक्त कार्यक्रम में विशेष अतिथि न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल, विशिष्ट अतिथि न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू एवं न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने भी सभा को संबोधित किया एवं लोकतंत्र को सफल बनाने में संविधान के विभिन्न आयामों पर अपने विचार व्यक्त किये और कार्यशाला को उपयोगी एवं सफल बनाने में योगदान दिए। मनोज विश्वनाथ परांजपे वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अदिती सिंधवी अधिवक्ता के द्वारा भी अपने वक्तव्य में न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में संविधान के महत्ता को रेखांकित किया गया।

समारोह में न्यायाधीश नरेन्द्र कुमार व्यास, न्यायाधीश नरेश कुमार चन्द्रवंशी, न्यायाधीश दीपक कुमार तिवारी, न्यायाधीश सचिन सिंह राजपूत, न्यायाधीश राकेश मोहन पाण्डेय, न्यायाधीश राधाकिशन अग्रवाल, न्यायाधीश संजय कुमार जायसवाल, न्यायाधीश रविन्द्र कुमार अग्रवाल, न्यायाधीश अरविन्द कुमार वर्मा, न्यायाधीश विभू दत्ता गुरु एवं न्यायाधीश अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की सम्मानपूर्ण उपस्थिति भी रही, जिससे कार्यक्रम का गौरव और बढ़ गया।

इस कार्यक्रम में महाधिवक्ता, प्रशासक उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ, वरिष्ठ अधिवक्तागण, छ.ग. उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल, रजिस्ट्री के अधिकारीगण, छत्तीसगढ़ न्यायिक अकादमी एवं छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारीगण, अधिवक्तागण, प्रशिक्षु न्यायाधीशगण, न्यायालयीन अधिकारीगण एवं कर्मचारीगण और इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया के प्रतिनिधि शामिल थे।

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