

मूकनायक
छत्तीसगढ़
भारतीय बौद्ध महासभा के राष्ट्रीय ट्रस्टी एस आर. कांडे ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहां है कि हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रात्मक एवं धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है भारतीय संविधान में सभी धर्म को समानता का अधिकार दिया है और सभी को अपने-अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने का हक प्रदान करता है ।भारतीय संस्कृति में विविधता है यही विविधता हमारी सांस्कृतिक विरासत है विविधता में एकता ही हमारी अखंडता है हम सभी नागरिकों को भारतीय संविधान का सम्मान करना चाहिए ।पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में जो कुछ चल रहा है यह देश के लिए शुभ संकेत नहीं है कभी हिंदू मुस्लिम कभी जातीय उन्माद कभी कांवरियों द्वारा सरे आम सार्वजनिक सड़कों पर बसों पर हमला मोटरसाइकिलों पर तोड़फोड़ बेकसूर नागरिकों के साथ मारपीट सुरक्षा कर्मियों के साथ मारपीट करना और कानून को अपने हाथों में लेना संवैधानिक प्रक्रियाओं की अवमानना करना l अभी-अभी अभी हाल में घटित घटना भारतीय संस्कृति को शर्मसार करने वाली है l भारत की सर्वोच्च अदालत जो न्याय और संविधान की अंतिम व्याख्या कर मानी जाती है आज शर्मसार है सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश बी . आर .गवई के ऊपर जूता फेंकने की कोशिश की गई । यह घटना केवल एक अदालत में बदतमीजी नहीं बल्कि यह उस जहरीले विचारधारा का परिणाम है जिसमें धर्म के नाम पर हिंसा और नफरत को सामान्य बना दिया है l सवाल यह है कि आखिर समाज के भीतर यह जहर आया कहां से, कब से यह तय होने लगा की जिसे अपने विचारों से , अलग हो उसे पर हमला कर देना धर्म रक्षा कहलन लगा । धर्मांधता के नाम पर जो गुंडागर्दी और अराजकता देश में फैल रही है वह अब अदालत की चौखट तक पहुंच चुकी है यह वही तत्व है जिन्हें मुसलमान से दुश्मनी है ईसाइयों से नफरत है सिखों और बौद्धों से दूरी है और अपने ही समाज के कमजोर वर्गों से असहज्ता है इसका मकसद धार्मिक नहीं राजनीति है और इनका अस्तित्व दूसरों को छोटा अपमानित और भयभीत करने पर टिका हुआ है । सार्वजनिक सड़कों पर तोड़फोड़ धमकियां और नंगा प्रदर्शन दूसरों के पूजा स्थलों पर घुसकर उपद्रव करना दलित और कमजोर लोगों पर अत्याचार करना यह सब उसे धर्मांधता का चेहरा है जो अब कानून संविधान और सभ्यता के हर मानक को रोंड़ाता जा रहा है l एक गरीब मजदूर के मुंह पर पेशाब करने वाला इन्हीं ग्रहों से प्रेरित होकर अपने अपराध को धर्म की दल में छिपा लेता है यही सबसे बड़ा खतरा है जिस देश ने संविधान को सर्वोच्च माना था वहां अब ऐसे लोग पैदा हो रहे हैं जो अदालत में जूता लेकर पहुंच जाते हैं l यह न केवल न्यायपालिका पर हमला है बल्कि भारतीय गणराज्य की आत्मा पर हमला है यह समस्या किसी धर्म की नहीं बल्कि उसे मानसिकता की है जो धर्म का उपयोग सत्ता और प्रभुत्व के औजार के रूप में करती है जो विचारधारा अपने अनुयायियों को नफरत सिखाती है वह किसी भी राष्ट्र के लिए आत्मघाती होती है आज भारत में भी यही आत्मघात खुलकर मंचों में तारों और अदालतों तक पहुंच चुका है यह घटना एक चेतावनी है कि अगर हमने धर्म के नाम पर चल रहे इस उन्माद का प्रतिरोध नहीं किया तो कल यही उन्माद संविधान न्याय और स्वतंत्रता, बंधुता,. सामान्य सबको निगल जाएगा।

