लोकतंत्र की मजबूती केवल जनता की शक्ति या संसद के अधिकार से तय नहीं होती, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा ही उसे वास्तविक रूप से जीवित रखती है। न्यायपालिका वह स्तंभ है जिस पर संविधान की पूरी इमारत खड़ी है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के परिसर में देश के सरन्यायाधीश पर हुआ हमला केवल एक व्यक्ति पर हुआ अपराध नहीं है, बल्कि यह संविधान, न्याय और लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा आघात है। न्याय का मंदिर कहे जाने वाले सर्वोच्च न्यायालय की पवित्रता को लांघने का यह दुस्साहस पूरे राष्ट्र के लिए चेतावनी है। यह घटना हमें यह सोचने पर विवश करती है कि यदि देश का सर्वोच्च न्यायालय और उसके प्रमुख सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिक का विश्वास और सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? यह हमला असल में देश की न्यायिक व्यवस्था को कमजोर करने और समाज में भय व अविश्वास फैलाने का षड्यंत्र है। आज आवश्यकता केवल निंदा की नहीं, बल्कि ठोस और निर्णायक कार्रवाई की है। इस हमले में संलिप्त व्यक्तियों को तत्काल गिरफ्तार कर कठोर से कठोर दंड दिया जाना चाहिए। ऐसी सज़ा मिसाल बने, ताकि भविष्य में कोई भी न्यायपालिका की गरिमा पर हाथ उठाने का दुस्साहस न कर सके।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि शासन और प्रशासन न्यायपालिका की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करे और उसे और अधिक सशक्त बनाए। न्यायपालिका पर हमले का अर्थ है नागरिकों के अधिकारों पर हमला। इसलिए पूरे समाज को, सभी दलों को और प्रत्येक नागरिक को इस घटना के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी होगी।
लोकतंत्र तभी सशक्त होगा जब न्यायपालिका स्वतंत्र, निर्भय और सुरक्षित होकर कार्य कर सके। न्यायालय और न्यायाधीशों की गरिमा अक्षुण्ण रहनी चाहिए, क्योंकि वहीं से संविधान की आत्मा और जनता का विश्वास जीवित रहता है। सरन्यायाधीश पर हमला दरअसल न्याय और संविधान की आत्मा पर हमला है। लोकतांत्रिक भारत में इस अपराध को कभी भी सहन नहीं किया जाएगा।

