मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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भाषा और संस्कार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। भाषा वह माध्यम है, जिसके द्वारा हमारे संस्कार और सांस्कृतिक मूल्य अभिव्यक्त होते हैं। यदि किसी समाज के संस्कार दूषित होते हैं, तो उसकी भाषा भी अशिष्ट और अमर्यादित हो जाती है। इसी तरह, यदि हम अपनी भाषा में मर्यादा और सम्मान बनाए रखते हैं, तो हम अपने उच्च संस्कारों का परिचय देते हैं। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित है कि “भाषा संस्कार से बनती है”, क्योंकि यह व्यक्ति के आंतरिक गुणों और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिबिंब होती है।
भाषा संस्कार से बनती है, जिस इंसान के जैसे संस्कार होंगे, वैसी उसकी भाषा होगी । जब कोई आदमी भाषा बोलता है तो उसके साथ संस्कार भी बोलते हैं और यही कारण है कि भाषा शिक्षक का दायित्व बहुत चुनौती पूर्ण है । सोचना और महसूस करना तो ऐसे कारक हैं जिसमें भाषा सही आकार पाती है क्योंकि इनके बिना भाषा, भाषा नहीं है । इनके बिना भाषा संस्कार नहीं बन सकती । इनके बिना भाषा युगों युगों का लंबा सफर तय नहीं कर सकती और इसके बिना कोई भाषा किसी देश व समाज की धड़कन नहीं बन सकती । यदि हम अपनी भाषा में मर्यादा और सम्मान बनाए रखते हैं, तो हम अपने उच्च संस्कारों का भी परिचय देते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

