मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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“बुझते नहीं कुछ चिराग हवाओं के ज़ोर से” सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि चुनौतियों और मुश्किलों का सामना करने से ही हमारा चरित्र निखरता है। हवाओं का ज़ोर हमें कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि हमें और मजबूत बनाने के लिए होता है। इसलिए हमें अपनी आशा का चिराग़ जलाए रखना चाहिए क्योंकि यही हमें हर अंधकार से बाहर निकालने की शक्ति देता है। तूफ़ान में वही पेड़ टिक पाते हैं, जिनकी जड़ें गहरी होती हैं। इसी तरह, जिन लोगों के इरादे मजबूत होते हैं, वे हर मुश्किल का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं। यह कहावत हमें लचीलापन सिखाती है, यानी परिस्थितियों के अनुसार ढ़़लना, लेकिन अपने मूल सिद्धांतों पर अडिग रहना।
जीवन में कई बार ऐसा समय आता है, जब सब कुछ खोया हुआ महसूस होता है। निराशा की आंधी हमारे चारों तरफ घूमती है। ऐसे में, यह विचार हमें यह याद दिलाता है कि आशा का एक छोटा सा चिराग़ भी अँधेरे को दूर कर सकता है। यह हमें बताता है कि चाहे कुछ भी हो, हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। दुनिया के इतिहास में ऐसे कई महान लोग हुए हैं, जिन्होंने इस कहावत को सच साबित किया है। स्वतंत्रता सेनानी, वैज्ञानिक और समाज सुधारक, सभी ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटाया। ज्योतिबा फुले, डॉ भीमराव अम्बेडकर, नेल्सन मंडेला और मदर टेरेसा जैसे अनेक लोगों व महापुरुषों ने समाज में अपने दृढ़ विश्वास से ही बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई, जबकि उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

