मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन में बुढ़ापा, रोग, मृत्यु और इच्छाओं की अपूर्णता दुख का कारण बनती है । यह बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्यों में से पहले, ‘दुःख सत्य’ का हिस्सा है, जिसमें जीवन के इन स्वाभाविक और सार्वभौमिक कष्टों को शामिल किया गया है । इन अवस्थाओं से उत्पन्न होने वाला दुःख व्यक्ति को व्याकुल करता है क्योंकि ये जीवन के अनिवार्य भाग हैं । बुद्ध के अनुसार इन अवस्थाओं बुढ़ापा अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, लेकिन यह शारीरिक और मानसिक कमजोरियों का कारण बनता है, जिससे व्यक्ति बीमार पड़ सकता है और जीवन के अंत की शुरुआत होती है । रोग शरीर को कष्ट देते हैं और जीवन की गुणवत्ता को कम करते हैं । वहीं मृत्यु जीवन का अंत है और सभी नश्वर प्राणियों के लिए अपरिहार्य है । मृत्यु का भय और जीवन के अंत की समझ भी एक प्रकार का दुःख ही है । इसके साथ ही जब हमारी इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो हम दुःख का अनुभव करते हैं । बुद्ध का यह मार्ग ज्ञान, सदाचार और ध्यान के माध्यम से दुख और कामनाओं के चक्र से मुक्ति दिलाने में मदद करता है ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

