मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मन को नियंत्रित करना एक कला है। इस की प्रवृत्ति अति चंचल है, उस नटखट बालक की तरह जो एक पल यहां तो दूसरे पल कहीं और होता है। जिस प्रकार बालक को अनुशासित करना पड़ता है उसी प्रकार मन को भी अनुशासित करने की आवश्यकता है । मन के जीते जीत है मन के हारे हार। हार जीत परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है। मन के हारने पर ही व्यक्ति हार जाता है और मन के जीतने से ही जीतता है। मन इतना शक्तिशाली है कि यह जैसा चिंतन करता है, वैसा ही यथार्थ में होता है ।
मन ज्ञान प्राप्ति का सहायक उपकरण है । ज्ञान चाहे बाह्य वस्तुओं का हो या आंतरिक अवस्थाओं का हो, सब तरह के ज्ञान का आवश्यक उपकरण मन ही है । मन के समक्ष दो या दो से अधिक विकल्प होने पर संशय उत्पन्न होता है और संशय का निराकरण भी ज्ञान द्वारा ही होता है । मन चंचल स्वभाव का है । मन एक ही क्षण में किसी लोक में तथा अगले क्षण किसी दूसरे लोक में पंहुच जाता है, परन्तु पंहुचता कहीं नहीं क्योंकि जो पंहुचे है, वे मन छोड़कर ही पंहुचे हैं । काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह आदि सब मन के ही विकार हैं । इस स्थिति में मन पर नियंत्रण करके ही इन मनोविकारों से मुक्ति पाना सम्भव है ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

