Thursday, February 26, 2026
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जिनको बनना था अपने समाज समुदाय की आवाज वह वोट लेकर बन गए पार्टियों के गुलाम

84 लोकसभा और 600 विधानसभा सीटें आरक्षित, फिर भी दलितों का भला क्यों नहीं?

मूकनायक /संजय सोलंकी
सीहोर/ मध्य प्रदेश

नई दिल्ली, भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के उत्थान के लिए लोकसभा में 84 और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में लगभग 600 सीटें आरक्षित की हैं। इसके बावजूद, दलित समुदाय आज भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर है। सवाल उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में आरक्षित सीटों के बावजूद दलितों की स्थिति में सुधार क्यों नहीं हो रहा? क्या चुने गए जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल हैं, या वे राजनीतिक दलों के गुलाम बनकर रह गए हैं?
आरक्षण का उद्देश्य और वास्तविकता
भारतीय संविधान के तहत, लोकसभा की 543 सीटों में से 84 अनुसूचित जाति और 47 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इसी तरह, राज्यों की विधानसभाओं में कुल 3,961 सीटों में से 543 अनुसूचित जाति और 527 अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित हैं। इसका मकसद दलित और आदिवासी समुदायों को संसद और विधानसभाओं में आनुपातिक प्रतिनिधित्व देना था, ताकि उनकी आवाज बुलंद हो और उनकी समस्याओं का समाधान हो सके।
लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग है। विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि आरक्षित सीटों से चुने गए जनप्रतिनिधि अक्सर अपने समुदाय के हितों के बजाय अपनी राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे को प्राथमिकता देते हैं। एक प्रमुख दलित कार्यकर्ता, डॉ. संजय पासवान, ने कहा, “आरक्षित सीटों पर चुने गए अधिकांश जनप्रतिनिधि अपनी पार्टी के प्रति वफादारी दिखाते हैं, न कि अपने समुदाय के प्रति। वे पार्टी लाइन से हटकर बोलने से डरते हैं, क्योंकि उनकी राजनीतिक सफलता पार्टी नेतृत्व पर निर्भर करती है।”
क्या जनप्रतिनिधि हैं पार्टियों के गुलाम?
2017 में बीबीसी की एक रिपोर्ट में इस मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाए गए थे। इसमें कहा गया कि आरक्षित सीटों से चुने गए लगभग 1,200 जनप्रतिनिधियों ने अपने समुदाय को लगातार निराश किया है। इसका कारण उनकी “संरचनात्मक मजबूरी” है, क्योंकि उनका चुना जाना केवल दलित वोटों पर निर्भर नहीं होता। सामान्य वोटरों का भी समर्थन चाहिए होता है, जिसके लिए वे पार्टी लाइन का पालन करते हैं। इस वजह से वे दलित हितों के लिए आक्रामक रूप से संघर्ष करने से बचते हैं, ताकि अन्य समुदायों को नाराज न करें।
2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सभी 17 आरक्षित सीटें जीती थीं, लेकिन दलित समुदाय के लिए ठोस नीतियों का अभाव रहा। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी), जो दलितों की सबसे बड़ी प्रतिनिधि मानी जाती थी, 19.6% वोट पाने के बावजूद एक भी सीट नहीं जीत सकी। यह दिखाता है कि दलित वोटों का बंटवारा और राजनीतिक दलों की रणनीति ने दलित नेतृत्व को कमजोर किया है।
दलित समुदाय की चुनौतियां
दलित समुदाय आज भी शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों पर संघर्ष कर रहा है। गौरक्षा और गोमांस पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों ने दलितों की आजीविका को प्रभावित किया है, क्योंकि पारंपरिक रूप से वे चमड़ा उद्योग से जुड़े रहे हैं। सहरानपुर हिंसा (2017) और रोहित वेमुला आत्महत्या (2016) जैसे मामले दलितों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव की गंभीर स्थिति को दर्शाते हैं।
दिल्ली में 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) ने सभी 12 आरक्षित सीटें जीतीं, लेकिन दलित बस्तियों में साफ-सफाई और बुनियादी सुविधाओं की कमी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। बीजेपी और कांग्रेस ने भी दलित वोटरों को लुभाने के लिए कई वादे किए, लेकिन इनका प्रभाव सीमित रहा।
आगे का रास्ता
कई विशेषज्ञों का मानना है कि आरक्षित सीटों की व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत है। कुछ का सुझाव है कि दलित हितों के लिए स्वतंत्र और आक्रामक नेतृत्व को बढ़ावा देना होगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को दलित नेताओं को ज्यादा स्वायत्तता देनी होगी, ताकि वे अपने समुदाय की वास्तविक समस्याओं को उठा सकें। साथ ही, दलित समुदाय को शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण के जरिए मजबूत करने की जरूरत है, ताकि वे अपनी आवाज खुद बुलंद कर सकें।
निष्कर्ष: आरक्षित सीटें दलितों को संसद और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व तो देती हैं, लेकिन यह प्रतिनिधित्व सांकेतिक बनकर रह गया है। जब तक जनप्रतिनिधि अपनी पार्टी के बजाय समुदाय के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे, तब तक दलितों का भला होना मुश्किल है। क्या यह समय नहीं कि इस व्यवस्था पर खुली बहस हो और दलितों के लिए सच्चा सशक्तीकरण सुनिश्चित किया जाए?

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