मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
नमस्कार साथियों, वैसे तो कल ही लिखना चाहता था, लेकिन आजादी के पर्व की खुशी में खलल नहीं पड़े इसलिए कलम नहीं चली…. खैर मन और मस्तिष्क ने कहा, कल नहीं तो आज सही, जो चल रहा है लिख डाल… सो हाजिर हूँ…
कल पूरे देश ने आजादी का जश्न मनाया। जगह-जगह फहराते तिरंगे ने देश भक्ति की आभा को जीवंत किया, लेकिन सिर्फ मेरे ही नहीं बल्कि हमारे हिंडौन सहित पूरे देशभर के आवाम के मन मे प्रश्न कोंधता रहा कि क्या वास्तविकता में हम आजाद है?
देखो भाई मैं आपकी तो नहीं लेकिन मेरी बताऊंगा…कम से कम मेरा मन तो कहता है कि साहब,
मैं तो गुलाम हूं…
मैं गुलाम हूं उस करप्ट सिस्टम का जहां बिना मिठाई पानी के फाइल खसकती ही नहीं।
मैं गुलाम हूं, अपनी उस मजबूरी का जहां मुझे 8 घण्टे लिखने की कहकर 12 घण्टे पेला जाता है।
मैं गुलाम हूं उस सड़े हुए सिस्टम का जहां बेतरतीब बनाई गई ऊँची नीची, टूटी और गड्डो वाली सड़कों पर ही चलना मेरी मजबूरी है।
मैं गुलाम हूं मेरी मजबूरी का जहां बिजली का बिल हर महीने एटम बम की तरह गिरता है।
मैं गुलाम हूं उस गन्दी व्यवस्था का जहां चोर डाकू सीट पर और साहूकार जमीन पर बैठते हैं।
मैं गुलाम हूं उस अवस्था का जहां भयानक गर्मी में पानी की एक बाल्टी के लिए लोगों को महाभारत रचनी पड़े।
मैं गुलाम हूं उस व्यवहार का जहां 100 मेसे 99 बेईमान हैं फिर भी कहते हैं मेरा भारत महान है।
मैं गुलाम हूं उस माहौल का जहां बूढ़ा बाप वृद्धाश्रम में और डॉगी बैड पर सोता है।
मैं गुलाम हूं उस मंजर का जहां मित्र बनकर मित्र के सीने मे खंजर घोंपा जाता है।
अब आप ही बताओ कैसे कह दूँ कि, मैं आजाद हूं। अगर आप भी ऐसे ही जूझ रहे है तो कमेंट में लिखिए, मैं भी गुलाम हूँ।
लेखक: ओमप्रकाश सुमन
वरिष्ठ पत्रकर

