Thursday, February 26, 2026
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हिमांचल सरकार की जॉब ट्रेनी योजना काम लो नौकरी की गारंटी नहीं |

नौकरी की तलाश में लगे युवाओं के लिए दो वर्ष की अनिश्चितता, पक्षपात, और असमानता, का नया अध्याय |

मूकनायक/ नीरज कुमार/ शिमला संभाग प्रभारी | भारत में बेरोजगारी की चुनौती से निपटने के लिए सरकारें समय-समय पर विभिन्न योजनाएँ लेकर आती रही हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार की “जॉब ट्रेनी योजना” भी ऐसी ही एक पहल है, जिसका उद्देश्य युवाओं को दो वर्ष तक व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर दक्षता परीक्षा के आधार पर नियमित रोजगार प्रदान करना है। सतह पर यह योजना आशाजनक लगती है—प्रतियोगी परीक्षा में मेरिट, दो वर्ष का प्रशिक्षण, दक्षता परीक्षा और फिर स्थायी नौकरी। किंतु धरातल पर इसकी वास्तविकता कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यह योजना न केवल अनिश्चितता और असमानता को बढ़ावा देती है, बल्कि सामाजिक न्याय और पारदर्शिता जैसे मूल्यों को भी चुनौती देती है।
योजना का स्वरूप,वादे और वास्तविकता को अगर देखें तो जॉब ट्रेनी योजना के तहत मेरिट के आधार पर चयनित युवाओं को दो वर्ष तक किसी विभाग या संस्थान में बतौर प्रशिक्षु के रूप में कार्य करने का अवसर दिया जाएगा। इस दौरान उन्हें सीमित मानदेय दिया जाएगा, और वादा किया जाएगा कि दक्षता परीक्षा में सफल होने पर उन्हें स्थायी नियुक्ति मिलेगी। यह प्रारूप नौकरी की तलाश में जूझ रहे युवाओं के लिए आकर्षक लग सकता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई खामियाँ उजागर हो रही हैं।
व्यावहारिक खामियाँ और चिंताएँ
आरक्षण नीति पर सवाल: योजना के प्रारंभिक चयन में आरक्षण नीति का पालन किया जाएगा, जो सामाजिक न्याय की दृष्टि से सकारात्मक है। किंतु दक्षता परीक्षा में आरक्षण को दरकिनार करने की आशंका इसे विवादास्पद बनाती है। इससे वंचित वर्गों के लिए अवसरों का ह्रास होगा, और जो सामाजिक समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। क्या यह योजना वास्तव में सभी वर्गों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करती है | इस पर भी प्रश्नचिन्ह खडे करता है |
कार्यभार और अध्ययन में टकराव: ट्रेनी अभ्यार्थी पर नियमित कर्मचारियों जैसा कार्यभार लादा जाएगा, जिससे उनके पास दक्षता परीक्षा की तैयारी के लिए समय या ऊर्जा नहीं बचेगी। दो वर्ष तक कार्य के दबाव में रहने के बाद उनसे उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा करना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि अन्यायपूर्ण भी है। यह स्थिति युवाओं को असफलता की ओर धकेलेगी।
पक्षपात और भाई-भतीजावाद का खतरा: यदि प्रबंधन या वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा ट्रेनी की आंतरिक रिपोर्ट में पक्षपात किया जाता है, तो निष्पक्ष चयन प्रक्रिया खतरे में पड़ सकती है। अनुशंसा और चाटुकारिता पर आधारित निर्णय न केवल योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय करेंगे, बल्कि संस्थानों की विश्वसनीयता को भी कम करेंगे।
रोजगार की अनिश्चितता: यह योजना कोई ठोस गारंटी नहीं देती कि सभी ट्रेनी को नियमित नियुक्ति मिलेगी। उदाहरण के लिए, यदि 100 ट्रेनी चयनित होते हैं, तो संभव है कि केवल 50 या उससे भी कम को स्थायी नौकरी मिले। शेष ट्रेनी के दो वर्ष का समय और परिश्रम व्यर्थ जा सकता है, क्योंकि न तो उन्हें प्रमाणित प्रशिक्षण मिलेगा और न ही कोई वैकल्पिक अवसर। यह स्थिति युवाओं में निराशा और अविश्वास को जन्म देगी।
मनोबल और उत्पादकता पर असर: कम मानदेय और अनिश्चित भविष्य के कारण ट्रेनी का मनोबल प्रभावित हो सकता है, जिसका असर उनकी कार्यक्षमता और संस्थानों की सेवा गुणवत्ता पर पड़ेगा। यदि कोई ट्रेनी कार्य में दक्ष हो जाता है, लेकिन परीक्षा में असफल हो जाता है, तो यह योजना की संरचना में गंभीर खामी को दर्शाएगा। वहीं इसका दूसरा पहलू भी है |
क्या अनुबंध आधारित योजनाएँ बेहतर थीं?
पूर्व में लागू अनुबंध आधारित नौकरी योजनाएँ, जो पूर्ण वेतन, सेवा शर्तें और कार्य अनुभव प्रदान करती थीं, इस प्रस्तावित योजना की तुलना में अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक थीं। जॉब ट्रेनी योजना में न तो नौकरी की सुरक्षा है, न ही पर्याप्त वेतन, और न ही युवाओं के लिए सम्मानजनक स्थान। यदि यह योजना अपने वर्तमान स्वरूप में लागू होती है, तो यह युवाओं के लिए अनिश्चितता और असमानता का कारण बन सकती है।
यदि हिमाचल सरकार इस योजना को वास्तव में युवा हितैषी और प्रभावी बनाना चाहती है, तो भविष्य में निम्नलिखित सुधार आवश्यक होंगे: चयन और दक्षता परीक्षा दोनों में आरक्षण नीति का सख्ती से पालन हो। ट्रेनी को कार्य के साथ-साथ दक्षता परीक्षा की तैयारी के लिए समय और संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ। दक्षता परीक्षा और आंतरिक मूल्यांकन में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जाए। योजना शुरू होने से पहले ही स्थायी पदों की संख्या और चयन प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
हिमाचल सरकार की जॉब ट्रेनी योजना युवाओं को रोजगार के अवसर देने का एक प्रयास है, लेकिन इसके प्रस्तावित स्वरूप में कई कमियाँ हैं, जो इसे ‘सस्ते श्रम’ की नीति में बदल सकती हैं। यदि भविष्य में इसे लागू किया जाता है, तो यह योजना न तो युवाओं का भला करेगी और न ही संस्थानों की गुणवत्ता बढ़ाएगी। सरकार को चाहिए कि वह इन चिंताओं को गंभीरता से ले और योजना को निष्पक्ष, पारदर्शी, और समावेशी बनाए। अन्यथा, यह योजना युवा भारत के भविष्य को सशक्त करने के बजाय उनकी आकांक्षाओं पर कुठाराघात कर सकती है।

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