भोपाल से संजय सोलंकी की रिपोर्ट।
शहडोल, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में एक चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है, जिसने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां दो सरकारी स्कूलों में महज 24 लीटर ऑयल पेंट के इस्तेमाल के लिए 443 मजदूरों और 215 मिस्त्रियों को काम पर रखने का दावा किया गया है, जिसके लिए 3.38 लाख रुपये से अधिक का बिल बनाया गया। इस मामले ने सोशल मीडिया पर तूफान मचा दिया है, और लोग इसे भ्रष्टाचार का “अजब-गजब” नमूना बता रहे हैं।क्या है पूरा मामला?
शहडोल जिले के ब्यौहारी विधानसभा क्षेत्र के सक्कंदी सरकारी हाई स्कूल में केवल 4 लीटर ऑयल पेंट से दीवारों की पुताई के लिए 168 मजदूर और 65 मिस्त्री लगाए गए, जिसके लिए 1.06 लाख रुपये का बिल बनाया गया। वहीं, निपानिया के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 20 लीटर पेंट, 10 खिड़कियां और 4 दरवाजों की मरम्मत के लिए 275 मजदूर और 150 मिस्त्री दिखाए गए, जिसका बिल 2.31 लाख रुपये का था। हैरानी की बात यह है कि स्थानीय स्तर पर जांच में पता चला कि इन दोनों गांवों में इतनी संख्या में मजदूर और मिस्त्री उपलब्ध ही नहीं हैं। फिर भी, बिलों को स्कूल के प्राचार्यों और जिला शिक्षा अधिकारी पीएस मरपाची के हस्ताक्षर के साथ पास कर दिया गया। सोशल मीडिया पर हंगामासोशल मीडिया पर वायरल हुए इन बिलों ने लोगों का गुस्सा भड़का दिया है। एक यूजर ने लिखा, “4 लीटर पेंट के लिए 233 लोग? यह तो गणित का चमत्कार है!” वहीं, एक अन्य यूजर ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की, “कुछ तो शर्म करो, सरकार भी इसमें शामिल है!”
जांच के आदेश, सरकार हरकत में
मामले के तूल पकड़ने के बाद स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने जांच के आदेश दे दिए हैं। उनका कहना है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। बिलों को बिना उचित जांच के पास करने के लिए जिला कोषागार अधिकारी को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। क्या कहते हैं जानकार?
जानकारों का मानना है कि यह घोटाला केवल शहडोल तक सीमित नहीं हो सकता। यह सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता की कमी और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को दर्शाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह के फर्जी बिल बनाकर सरकारी खजाने को लूटने की यह कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन इस बार आंकड़ों की हास्यास्पदता ने इसे सुर्खियों में ला दिया। आगे क्या?
मामले की जांच शुरू हो चुकी है, और लोग इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि क्या दोषियों को सजा मिलेगी या यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी तंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता की जरूरत को रेखांकित किया है।

