
मूकनायक
बिलासपुर छत्तीसगढ़
आज 30 जून को फूले निःशुल्क पाठशाला के विद्यार्थियों ने भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम (1857) की एक महान और विस्मृत नायिका वीरांगना उदा देवी पासी को भावपूर्ण स्मरण किया। यह कार्यक्रम मात्र एक जयंती समारोह नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ एक छोटी सी आवाज थी, जो वर्षों से महान नायक–नायिकाओं को इतिहास से मिटा देने की कोशिशों के खिलाफ उठ रही है।
हम जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गाथा पढ़ते हैं, तो कुछ चुनिंदा नामों का ही बार-बार उल्लेख होता है। लेकिन तिलका मांझी, झलकारी बाई, सिद्धो-कान्हू, मातादीन वाल्मीकि और उदा देवी पासी जैसे नाम या तो अनुपस्थित रहते हैं या हाशिए पर डाल दिए जाते हैं। यह एक जातिवादी इतिहास-लेखन की देन है, जिसमें भारत के नायकों की वीरता को अक्सर जानबूझकर भुला दिया गया है।
उदा देवी पासी न केवल 1857 की क्रांति की एक अग्रणी योद्धा थीं, बल्कि उन्होंने अपने पति की शहादत का बदला लेने के लिए ब्रिटिश सेना के 32 सैनिकों को मार गिराया, और अंततः वीरगति को प्राप्त हुईं। उनकी वीरता से ब्रिटिश सेना के जनरल कैम्पबेल तक स्तब्ध हो गया था और उसने हैट उतारकर उन्हें सलामी दी थी।
वे उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास उजिरियांव गाँव की रहने वाली एक दलित महिला थीं, जिनका बचपन से ही स्वाभिमानी और जुझारू स्वभाव था। नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल ने उनकी बहादुरी को देखकर उन्हें महिला सुरक्षा दस्ते की कमांडर नियुक्त किया था। यह पद मात्र सम्मान नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का प्रतीक था।
फूले निःशुल्क पाठशाला का उद्देश्य सिर्फ बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना नहीं है, बल्कि उन्हें इतिहास के उन पन्नों से भी जोड़ना है जिन्हें जानबूझकर फाड़ दिया गया। जब बच्चे ऊदा देवी जैसे नायिकाओं की गाथाएं सुनते हैं, तो वे आत्मगौरव, साहस और न्याय की भावना से ओतप्रोत होते हैं। यही शिक्षा का असल उद्देश्य है – सोचने, सवाल करने और आत्मसम्मान से जीने की प्रेरणा देना।
आज पाठशाला के बच्चों ने न केवल उदा देवी का चित्र प्रदर्शित किया, बल्कि उन्होंने यह भी जाना कि हमारे समाज के हर वर्ग ने आजादी की लड़ाई में बलिदान दिया है। उन्हें यह भी समझाया गया कि इतिहास को केवल पढ़ने की नहीं, दुबारा लिखने की जरूरत है – न्याय के साथ।
हम ऊदा देवी को ‘आदरांजलि’ नहीं, एक प्रेरणा के रूप में याद करते हैं। उनका जीवन यह बताता है कि सामाजिक रुकावटें चाहे जितनी हों, साहस और विवेक से उन्हें तोड़ा जा सकता है।
इस अवसर पर फूले निःशुल्क पाठशाला के शिक्षक और विद्यार्थियों ने मिलकर यह संकल्प लिया कि आने वाली पीढ़ियों को एक पक्षपातहीन और न्यायप्रिय इतिहास देंगे, जिसमें हर संघर्ष और हर बलिदान को बराबर जगह मिलेगी।

