मूकनायक संजय सोलंकी
पटना/बिहार
पटना, 22 जुलाई 2025: बुद्ध की धरती पाटलिपुत्र (पटना) में भीम आर्मी भारत एकता मिशन ने 21 जुलाई 2025 को अपना 10वां स्थापना दिवस और द्वितीय राष्ट्रीय अधिवेशन बापू सभागार में धूमधाम से मनाया। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में देशभर से आए कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया, जिसमें बिहार में संगठन की राजनीतिक जड़ें मजबूत करने की रणनीति पर जोर दिया गया बिहार में उभरता बहुजन आंदोलन
भीम आर्मी, जो दलित, पिछड़े, और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्षरत है, ने बिहार में अपनी सक्रियता बढ़ाने का संकल्प लिया। संगठन के संस्थापक और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने इस मौके पर कहा, “हम 90 प्रतिशत हैं, और 90 प्रतिशत हिस्सेदारी लेंगे।” यह नारा बिहार के बहुजन समाज में जोश भर रहा है।
पटना में जनसैलाब, राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन।
पटना के बापू सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुए। भीम आर्मी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अमर ज्योति और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) बिहार अध्यक्ष जौहर आजाद ने संगठन की मजबूती और बिहार में राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरने की बात कही। हाल के वर्षों में बिहार में हुई रैलियों, जैसे दिसंबर 2024 की “समाधान महारैली,” में उमड़े जनसैलाब ने यह साबित किया कि भीम आर्मी का जनाधार तेजी से बढ़ रहा है।
राजनीतिक रणनीति: क्या बदलेगा बिहार का समीकरण?
2019 में चंद्रशेखर आजाद ने घोषणा की थी कि भीम आर्मी औपचारिक रूप से चुनावी राजनीति में उतरेगी। 2020 में आजाद समाज पार्टी की स्थापना के बाद संगठन ने उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज की, और अब बिहार में भी इसे दोहराने की कोशिश हो रही है। बिहार में दलित और बहुजन वोटरों की बड़ी आबादी को देखते हुए, भीम आर्मी का यह कदम सत्तारूढ़ दलों के लिए चुनौती बन सकता है।
विरोध और सक्रियता का इतिहास।
भीम आर्मी ने बिहार में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर मुखरता दिखाई है। हाल ही में BTMC एक्ट 1949 और वक्फ संशोधन विधेयक के खिलाफ लोकतांत्रिक आंदोलन में संगठन ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके अलावा, दलितों और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए मुफ्त शिक्षा और सामाजिक न्याय की लड़ाई में भीम आर्मी ने अपनी पहचान बनाई है।
चुनौतियां और भविष्य।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में भीम आर्मी को बहुजन समाज पार्टी (BSP) और अन्य स्थापित दलों से कड़ी टक्कर मिल सकती है। हालांकि, चंद्रशेखर आजाद की युवा नेतृत्व और सामाजिक आंदोलनों में उनकी सक्रियता उन्हें एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश कर रही है। विश्लेषक आलोक भदौरिया के अनुसार, “चंद्रशेखर में तेवर है, और वह दलित आंदोलन का प्रतीक बन रहे हैं।”
आगे की राह।
पटना के इस आयोजन ने साफ कर दिया कि भीम आर्मी बिहार में न केवल सामाजिक, बल्कि राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने को तैयार है। संगठन की रणनीति गांव स्तर पर कार्यकर्ताओं को संगठित करने और बहुजन समाज को एकजुट करने पर केंद्रित है।
निष्कर्ष
भीम आर्मी का 10वां स्थापना दिवस बिहार में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत का संकेत देता है। यदि संगठन अपनी रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू करता है, तो बिहार की राजनीति में एक नया समीकरण देखने को मिल सकता है।

