मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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ईर्ष्या में, व्यक्ति किसी और की सफलता या खुशी से दुखी होता है और चाहता है कि उसके पास भी वही हो। वहीं, द्वेष में, व्यक्ति न केवल किसी और की सफलता से जलता है, बल्कि उसे नुकसान पहुंचाने की इच्छा भी रखता है । जो ईर्ष्यालु है और ईर्ष्यावश आपकी आलोचना कर रहा है, वह इंसान भी निश्चित रूप से अपने जीवन से खुश नहीं है। ऐसे लोगों की चिंता जीवन में कभी ना करें।वर्तमान दौर में अधिकतर लोग दूसरों के सुख को देखकर ही व्यथित व बेचैन रहते हैं । अक्सर मनुष्य बार बार यही सोच कर बेचैन रहता है कि दूसरों की भांति उसके पास अच्छा भवन, वस्त्र, अन्य सुविधायुक्त वस्तुएं व समाज में शौहरत क्यों नहीं हैं ?
दूसरों से द्वेष भावना में तुलना करने का यही भाव मनुष्य की अशांति, आंतरिक दुःख, पतन और ईर्ष्या का कारण होता है । मन हमेशा बेचैन रहता है, जबकि सब कुछ होते हुए भी ऐसा मनुष्य अतृप्त रहता है क्योंकि यह ईर्ष्या छूत से फैलने वाले एक रोग के समान शीघ्र ही विकसित होने वाला मनोभाव है । यहां यह सर्व विदित है कि आप चाहे सब-कुछ पा लें, परंतु फिर भी किसी ना किसी वस्तु का अभाव हमेशा बना ही रहता है और अभाव मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी कमजोरी है । अतः उत्तम मनुष्य वही है जो कल्पना के मायाजाल व ईर्ष्या जैसे मनोविकार के वश में ना होकर स्वयं के पास उपलब्ध वस्तुओं का ही सबसे उत्तम उपयोग करे क्योंकि स्वयं में काना बनकर दूसरों को अंधा देखना ही अनर्थकारी है
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

