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विशेष रिपोर्ट | (गोपाल मेघवंशी भीलवाड़ा)
देश में स्कूलों के लगातार बंद होने की खबरें चिंता बढ़ा रही हैं। कई राज्यों में बच्चों की घटती संख्या, शिक्षकों की कमी और सरकारी उपेक्षा के चलते हजारों स्कूल अब तक बंद हो चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर स्कूल ही नहीं रहेंगे तो आने वाली पीढ़ियां अपनी डिग्री आखिर दिखाएँगी कैसे?
ग्रामीण इलाकों में हालत और भी गंभीर है — कई गांवों में या तो स्कूल ताले में बंद हैं या फिर सिर्फ नाम के लिए चल रहे हैं। कहीं शिक्षकों की पोस्टिंग नहीं है तो कहीं पढ़ने वाले बच्चे ही नहीं बचे। कोरोना काल के बाद हालात और बिगड़ गए हैं, लेकिन अब तक सरकार कोई ठोस नीति नहीं बना पाई है।
जनता पूछ रही है — जब स्कूल बंद होंगे तो पढ़ाई कहाँ होगी? डिग्री कौन देगा?
सरकार नए स्कूल खोलने या पुराने सुधारने के वादे तो करती है, लेकिन ज़मीन पर हालात जस के तस हैं। कई राज्यों में तो ग्रामीण स्कूलों को जोड़कर मर्ज कर दिया गया है, जिससे बच्चों को दूर-दूर तक पढ़ने जाना पड़ता है।
क्या शिक्षा का यह हाल देश के भविष्य के लिए खतरे की घंटी नहीं है?
आज जब पढ़ाई-लिखाई सबसे जरूरी मानी जा रही है, ऐसे में स्कूलों की तालेबंदी भारत के विकास में बड़ा रोड़ा बन सकती है। जनता सरकार से मांग कर रही है कि हर गांव, हर मोहल्ले में अच्छी शिक्षा की व्यवस्था की जाए और बंद स्कूलों को दोबारा खोला जाए।
न रहेगा स्कूल, न रहेगी डिग्री — यह मजाक नहीं, बल्कि भविष्य का बड़ा संकट बन सकता है।
सरकार को चाहिए कि शिक्षा को प्राथमिकता दे और हर बच्चे के लिए किताब, स्कूल और शिक्षक की गारंटी सुनिश्चित करे। तभी ‘शिक्षित भारत – सक्षम भारत’ का सपना पूरा हो सकेगा।

