मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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दुख और दर्द में थोड़ा अंतर होता है। जब शरीर में कोई तकलीफ होती है, पीड़ा होती है, उसे दर्द कहते हैं। लेकिन जब उस दर्द के बारे में मन सोचने लगता है, उसका चिंतन करने लगता है, तब वह दर्द, दुख बन जाता है। या यूं कहें कि दर्द शरीर में होता है और दुख मन में होता है। कई बार दर्द थोड़ा होता है लेकिन उसका चिंतन उसे बड़ा कर देता है। अकसर इंसान दर्द के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ कर उसी का रूप बन जाता है क्योंकि इंसान भावनात्मक रूप से जितना कमजोर होता है, उतना ही जल्दी दुखी होने लगता है। हमें खुद को भीतर से मजबूत करना होगा। दर्द अधिकतर शारीरिक स्तर पर होता है, जबकि पीड़ा मानसिक, भावनात्मक और कभी-कभी शारीरिक दोनों स्तरों पर हो सकती है। दर्द क्षणिक हो सकता है, लेकिन पीड़ा दीर्घकालिक और गहरी हो सकती है।
दुःख, दर्द और पीड़ा जीवन का हिस्सा हैंदुःख, दर्द और पीड़ा जीवन का हिस्सा हैं, और हम उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकते, और हम उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकते, जीवन अविश्वसनीय रूप से अप्रत्याशित है, हम नहीं जान सकते कि कल क्या होने वाला है, और हमें यह जानने के लिए नकारात्मक भावनाओं को साबित करना होगा कि खुशी क्या है । दर्द अधिकतर शारीरिक स्तर पर होता है, जबकि पीड़ा मानसिक, भावनात्मक और कभी-कभी शारीरिक दोनों स्तरों पर हो सकती है। दर्द क्षणिक हो सकता है, लेकिन पीड़ा दीर्घकालिक और गहरी हो सकती है। इंसान को अप्रत्याशित बारिश और बिन बुलाए दर्द, दोनों को सहना पड़ता है। हर कोई दर्द से बचने के बजाय बेदर्द सुख चाहता है। कहते है कि धैर्य और समय दो सबसे शक्तिशाली उपचारक है। मन की शक्तियां सूर्य की किरणों के समान होती है, नजब वह एकाग्र होती है तो अंतर्मन को प्रकाशित करती है। इसलिए लोगों के दृष्टिकोण को लेकर ज्यादा मत सोचिए क्योंकि कई बार वह लोग हमारा मूल्यांकन ज्यादा करते हैं जिनका खुद कोई मूल्य नहीं होता…
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

