भ्रष्टाचार ने सरकारी व्यवस्था को किया खोखला, जनता पूछ रही है – जिम्मेदार कौन?
मूकनायक/ बद्री विशाल पजापति
सतना /मध्य प्रदेश
मध्यप्रदेश के सतना जिले में इन दिनों एक अघोषित सच्चाई गूंज रही है—”कोई विभाग नहीं बचा, हर जगह घोटाला चल रहा है।” आमजनता का भरोसा धीरे-धीरे तंत्र से उठता जा रहा है। चाहे वो स्वास्थ्य विभाग हो, शिक्षा, पंचायत, नगर निगम, राजस्व या पुलिस—हर जगह भ्रष्टाचार ने गहरी जड़ें जमा ली हैं। शिकायतें होती हैं, जांच के नाम पर खानापूर्ति होती है, लेकिन कार्रवाई नदारद।
स्वास्थ्य विभाग में लापरवाही और लूट
जिला अस्पताल में दवा खरीदी से लेकर एक्सरे मशीनों और अन्य मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति में अनियमितताएं उजागर हो चुकी हैं। एक RTI में सामने आया कि जो उपकरण महीनों से बंद पड़े हैं, उनका मेंटेनेंस भुगतान लगातार किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत और भी खराब है।
शिक्षा विभाग में कागजों पर स्कूल और भत्तों में खेल
सरकारी स्कूलों में फर्जी बच्चों की एंट्री कर छात्रवृत्ति हड़पने के मामले सामने आए हैं। बिना भवन वाले स्कूलों की मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन मौके पर कोई कार्य नहीं हुआ।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में खुला खेल
मनरेगा के तहत फर्जी हाजिरी लगाकर भुगतान लेने की शिकायतें आम हैं। ग्राम पंचायतों में नाली, सड़क और सामुदायिक भवन निर्माण में गुणवत्ता की अनदेखी और भुगतान में गड़बड़ी सामने आ चुकी है।
नगर निगम सतना में ठेकेदारी के खेल
नगर निगम में सफाई कार्य, सीवरेज लाइन और नालियों के निर्माण के नाम पर भारी गोलमाल हुआ है। सड़क मरम्मत के नाम पर सिर्फ बजट खर्च कर दिया गया, जमीन पर गड्ढे अब भी जस के तस हैं।
राजस्व विभाग में दलाली और रिश्वत का बोलबाला
नामांतरण, सीमांकन और पट्टे जैसे मामलों में बिना रिश्वत के फाइलें आगे नहीं बढ़तीं। कई मामलों में पटवारियों और अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में है, लेकिन जांच की रफ्तार धीमी है।
पुलिस विभाग पर भी सवालिया निशान
थानों में एफआईआर दर्ज करने में देरी और अवैध कारोबार पर मूकदर्शक बने रहने के आरोप लगते रहते हैं। हाल ही में सट्टा कारोबार को लेकर पुलिस की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
जनता परेशान, प्रशासन मौन
आए दिन अखबारों में घोटालों की खबरें छपती हैं, पर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ नोटिस या विभागीय जांच शुरू होती है, जिसका कोई नतीजा सामने नहीं आता। आमजन पूछ रहा है—क्या सतना में जवाबदेही नाम की कोई चीज़ बची है?
अब सवाल यह है कि कब तक यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा?
क्या सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधि मिलकर इस व्यवस्था को सुधारने का प्रयास करेंगे या जनता को खुद ही जवाब मांगने सड़क पर उतरना पड़ेगा?

