
मूकनायक/स्वराज मैश्राम
बिलासपुर , छत्तीसगढ़
फूले निःशुल्क पाठशाला के बच्चों ने आज दक्षिण भारत के क्रांतिकारी समाज सुधारक, दलित अधिकारों के प्रखर योद्धाऔर स्त्री सम्मान के लिए संघर्षरत नेता अय्यांकाली को उनके स्मृति दिवस पर भावभीनी आदरांजलि अर्पित की। कार्यक्रम में बच्चों ने उनके चित्र के साथ सामूहिक रूप से उन्हें नमन किया और उनके संघर्षों को याद किया।
अय्यांकाली जी ने वह ऐतिहासिक संघर्ष किया था, जिससे दलित महिलाओं को भी शरीर का ऊपरी भाग ढकने का मानवाधिकार मिला। उन दिनों दलित स्त्रियों को केवल पत्थर का कंठहार, लोहे की बालियां और विशेष प्रतीक पहनने की अनुमति थी — यह एक क्रूर जातिसत्तात्मक परंपरा थी। अय्यांकाली ने इस गुलामी के प्रतीक को चुनौती दी और दक्षिणी त्रावणकोर से आंदोलन की शुरुआत की। उनका साहसिक आह्वान था – “अब महिलाएं ब्लाउज पहनें और दासता का प्रतिकार करें।”
इस सामाजिक क्रांति के विरोध में दंगे हुए, लेकिन अंततः सवर्णों को झुकना पड़ा। अय्यांकाली और नायर नेता परमेश्वरन पिल्लई की उपस्थिति में सैंकड़ों दलित महिलाओं ने अपने गुलामी के प्रतीक आभूषणों को उतार फेंका।
उनकी उपलब्धियाँ केवल यहीं तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने पुलायारों (दलित खेतिहर मजदूरों) के लिए खाली पड़ी ज़मीन पर मालिकाना हक़, शिक्षा में प्रवेश, सार्वजनिक रास्तों पर आवाजाही की स्वतंत्रता और बढ़ी हुई मजदूरी जैसी मांगों को भी आंदोलन के केंद्र में रखा। उनकी पहल पर सरकार ने 500 एकड़ ज़मीन 500 दलित परिवारों में वितरित की — एक परिवार, एक एकड़।
1904 से दमे की बीमारी से जूझते हुए भी वे अंतिम साँस तक दलितों की आज़ादी की लड़ाई लड़ते रहे।
18 जून 1941 को उन्होंने देह त्यागी, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी समाज में बदलाव की प्रेरणा हैं।
फूले निःशुल्क पाठशाला की ओर से यह आयोजन न केवल आदरांजलि था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह बताने की भी कोशिश थी कि समानता, शिक्षा और सम्मान के अधिकारों की नींव किन क्रांतिवीरों ने रखी।

