Thursday, February 26, 2026
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मध्यप्रदेश में शिक्षा का दोहरा चेहरा: एक तरफ सरकारी स्कूल बंद होने की कगार पर।

दूसरी तरफ सरकार के मंत्री प्राइवेट स्कूलों का फीता काट कर उद्घाटन किया जा रहा। गरीब बच्चों का भविष्य खतरे में कोन जिम्मेदार।

मूकनायक समाचार संजय सोलंकी की रिपोर्ट।

भोपाल, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था का दोहरा चेहरा उजागर हुआ है। एक तरफ सरकारी स्कूलों के दरवाजे धीरे धीरे बंद हो रहे हैं, शिक्षकों की कमी और जर्जर भवनों के कारण लाखों गरीब बच्चों का भविष्य अंधकार में डूब रहा है। दूसरी तरफ, सरकार के नेता और मंत्री अब रंग-बिरंगे फीते काटकर प्राइवेट स्कूलों का शुभारंभ कर रहे हैं, जिनकी मोटी फीस गरीब परिवारों की पहुंच से कोसों दूर है।

सरकारी स्कूलों की बदहाली मध्यप्रदेश के कही जिलों में सरकारी स्कूल संसाधनों के अभाव में दम तोड़ रहे हैं कही शिक्षक नहीं हे तो कही स्कूल भवन ही नहीं है कही पर पानी की व्यवस्था नहीं हे तो कही पर शौचालय ही नहीं हे । शिक्षकों की कमी, टूटे-फूटे भवन, और बुनियादी सुविधाओं जैसे शौचालय और पीने के पानी का न होना, इन स्कूलों की हकीकत है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे दूर-दराज स्कूलों तक पहुंचने के लिए मजबूर हैं, लेकिन वहां भी पढ़ाई का स्तर निराशाजनक है। हाल ही में, राज्य शिक्षा केंद्र की नई मान्यता नीति के तहत निजीकरण को बढ़ावा देना पूंजीपति लोग स्कूलों के नाम पर अपना बिजनेश चला रहे हैं ।जिससे गरीब बच्चों के लिए शिक्षा के रास्ते और संकुचित हो रहे हैं।

प्राइवेट स्कूल का उद्घाटन, गरीबों के लिए तमाचा।हाल ही में सीहोर जिले की प्रभारी मंत्री कृष्णा गौर ने हाल ही में एक चमचमाते प्राइवेट स्कूल का उद्घाटन किया। लेकिन बंद होते शासकीय स्कूलों पर एक भी शब्द नहीं निकले प्राइवेट स्कूल की भारी-भरकम फीस और आधुनिक सुविधाएं केवल अमीर वर्ग के लिए सुलभ हैं क्योंकि गरीब की इतनी आमदनी नहीं जो वह बड़े ओर महंगे स्कूलों की फीस भर सके ।

उद्घाटन समारोह में मंत्री ने शिक्षा के महत्व पर लंबे-चौड़े भाषण दिए, लेकिन सरकारी स्कूलों की दुर्दशा पर एक शब्द नहीं बोला।

प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता दबदबा और सरकारी स्कूलों की उपेक्षा गरीब बच्चों के लिए अभिशाप बन रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य प्रदेश में 2014-15 से 2023-24 तक की व्यापक अवधि में लगभग 29,410 सरकारी स्कूल बंद हुए। 2020-21 से 2023-24 तक के लिए, अनुमानित रूप से 10,000 से 12,000 स्कूलों की कमी हो सकती है, जिसमें 2021-22 की 6,457 की कमी और बाद के वर्षों में शून्य नामांकन वाले स्कूल शामिल हैं यह अनुमानित आंकड़ा हे कबीर मिशन समाचार इसकी पुष्टि नहीं करता । क्योंकि वे सरकार की नई नीतियों के जटिल नियमों को पूरा नहीं कर पा रहे। दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की 20% तक अनुपस्थिति और संसाधनों की कमी शिक्षा व्यवस्था को खोखला कर रही है। सरकारी शिक्षकों का कहना हे कि सरकारी स्कूलों में ” गरीब बच्चे पढ़ते हैं, जिनके माता-पिता मजदूरी करते हैं। अब स्कूल बंद हुआ तो इन बच्चों का क्या होगा?”जनता में आक्रोश, सरकार पर सवाल लोगों का कहना है कि प्रभारी मंत्री का प्राइवेट स्कूल उद्घाटन गरीबों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। सोशल मीडिया पर भी इस घटना की तीखी आलोचना हो रही है। एक यूजर ने लिखा, “जब सरकारी स्कूलों में बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ रहे हैं, तब मंत्री प्राइवेट स्कूलों का रिबन काट रही हैं। यह गरीब बच्चों के भविष्य के साथ मजाक है।

“सरकार से जवाब की मांग इस घटना ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या शिक्षा केवल अमीरों का विशेषाधिकार बनकर रह जाएगी? क्या गरीब बच्चों को उनके सपनों से वंचित कर दिया जाएगा? जनता अब सरकार से मांग कर रही है कि सरकारी स्कूलों को मजबूत किया जाए, शिक्षकों की भर्ती हो, और शिक्षा सबके लिए सुलभ हो।मध्यप्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की बदहाली और प्राइवेट स्कूलों के प्रचार ने शिक्षा के क्षेत्र में गहरी खाई को उजागर किया है। अगर सरकार ने तुरंत कदम नहीं उठाए, तो लाखों गरीब बच्चों का भविष्य अंधेरे में खो सकता है। सवाल यह है कि क्या सरकार इन मासूम आवाजों को सुनेगी, या चमक-दमक के पीछे असल मुद्दों को अनदेखा करती रहेगी?

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