
मूकनायक/कमलेश लवहात्रै
बिलासपुर छत्तीसगढ़
जब रंगमंच केवल दृश्य और अभिनय नहीं, बल्कि विचार, व्यंग्य और संवेदना का वाहक बन जाए — तब वह दर्शकों को भीतर तक झकझोरने में सक्षम होता है। कुछ ऐसा ही अनुभव रहा रविवार को देवकीनंदन दीक्षित सभागार में, जहाँ अग्रज नाट्य दल द्वारा आयोजित द्वितीय योगेश स्मृति नाट्य समारोह का समापन नाटक “चैनपुर की दास्तान” की सशक्त प्रस्तुति के साथ हुआ।
यह नाटक क्लासिक रूसी नाटक इंस्पेक्टर जनरल का हिन्दी रूपांतरण है, जिसे वरिष्ठ रंगकर्मी रंजीत कपूर ने “चैनपुर की दास्तान” शीर्षक से तैयार किया। कुशल निर्देशन किया सुनील चिपड़े ने, जिन्होंने मूल कथा की राजनीतिक विडंबना और सामाजिक यथार्थ को हमारे समय से जोड़ते हुए अत्यंत सजीव मंच पर उतारा।
“चैनपुर” इस कथा का प्रतीक है — एक ऐसा गांव जहाँ व्यवस्थाएं केवल कागज़ों पर हैं, सत्ताएँ केवल दिखावे की हैं और आमजन हास्यास्पद स्थितियों में खुद को फँसा पाते हैं। यह नाटक हँसी के भीतर एक गहरी टीस छुपाए हुए है — संवाद तीखे हैं, दृश्य चुटीले, पर उनका अर्थ गहरा और समय के भीतर पैबस्त।
चम्पा भट्टाचारजी, संजय बघेल और अजय भास्कर के निर्देशन में संगीत इस प्रस्तुति की धड़कन बनकर उभरा। उनकी रचनाएँ कभी पात्रों की चुप्पी बनती रहीं, कभी उनके आक्रोश की प्रतिध्वनि। संगीत और अभिनय के इस संयोजन ने नाटक को केवल दृश्य न रखकर एक पूर्ण कलात्मक अनुभव बना दिया।
इस अवसर पर कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा — “रंगमंच जब समाज से संवाद करता है, तब वह केवल मंचन नहीं, बल्कि चेतना का उद्भव होता है। ‘चैनपुर की दास्तान’ ने व्यवस्था की त्रासदियों को जिस रूप में दर्शाया, वह हमारे भीतर की चुप्पि�

