मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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खूबसूरती की परिभाषा सबके लिए अलग -अलग है। कोई खूबसूरती चेहरे और शरीर की बनावट मेंं देखता है तो कोई व्यवहार में। किसी को खूबसूरती बोलने की कला और आवाज मेंं नज़र आती है तो कोई खूबसूरती प्रकृति मेंं देखता है। बस इन सभी मेंं समानता ये हैं कि खूबसूरती इन सभी के दिल मेंं प्यारा सा एहसास जगाती हैं, जो मन को सुकून देता हैं और संतुष्टि प्रदान करता हैं। जिस प्रकार वृक्ष की खुबसूरती उसके फूल, पतों में होती हैं, ठीक उसी प्रकार इंसान की खुबसूरती उसके आचरण और व्यवहार में होती है। इंसान की सच्ची खूबसूरती बाहरी रूप-रंग से ज्यादा आंतरिक गुणों से परिभाषित होती है। खुश रहना, दयालु होना, विनम्र होना, आत्मविश्वास रखना और अच्छी सोच रखना, ये सब सच्ची खूबसूरती के घटक हैं ।
जिस शरीर को लोग सुन्दर समझते हैं, मौत के बाद मौत के बाद वही शरीर सुन्दर क्यों नहीं लगाता ? उसे घर में ना रख कर जला क्यों दिया जाता है? जिस शरीर को सुन्दर मानते हो, जरा उसकी चमड़ी तो उतार कर देखो, तब हकीकत दिखेगी कि भीतर क्या है? भीतर तो बस रक्त, रोग, मल और, कचरा भरा पड़ा है, फिर यह शरीर सुन्दर कैसे हुआ ? शरीर में कोई सुन्दरता नहीं होती है, बल्कि अच्छे होते हैं इंसान के कर्म, विचार, वाणी व्यवहार और संस्कार । जिसके जीवन में यह सब कुछ है, वही मनुष्य इस दुनिया का सबसे सुन्दर इंसान है और ज़माना भी उसी का दिवाना है । कबीरदास जी ने अपने दोहे में भी कहा है कि “नहाए धोए क्या हुआ, ज़ब मन मैल न जाए । मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जाए ।।” अर्थात् नहाने धोने से क्या होगा, जब तक आपके मन का मैल नहीं जाता | मछली तो सदा जल में ही वास करती है, फिर भी उसमें से दुर्गन्ध आती है | कितना भी धो लें लेकिन उसका दुर्गन्ध नहीं जाता | इसी तरह मनुष्य को अपने मन को साफ रखना चाहिए, इसी में उसकी खूबसूरती है |
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

