मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
उठो नींद से जागो तुम आलस्यपन को त्यागों तुम भोर हुई सूरज भी अपनी आभापरिछाई की छटा बिखेर रहा है उठो नींद से जागो तुम सोना भी तरह का होता है एक में शारीरिक आलस्यपन होता है एक में आज नहीं कल कर लेंगे समय बिताने का भाव प्रबल होता है एक में आशा रहें दूसरों पर उससे ही परिवर्तन का भाव नजर आता है।।तीनों आलस्यपन से यह जीवन नीरस हो जाता है उठो नींद को त्यागों तुम आलस्यपन को त्यागों तुम आलस्यपन से बड़ा कोई शत्रु नहीं जो कोई समझें बनता वहीं चतुर सुजान आलस्यपन को जिनने त्यागावह एक दिन हो गए महान माना कि स्वारथ में जग अंधा है पर तुम क्यों अपने पैर समेटे बैठो होहाथ दिया कुछ करने के खातिर पैर दिया है चलने के खातिर मन दिया कऱो असीमित कल्पनाएं बुद्धि दिया है तर्क कर उत्तम कर्म करें चित् दिया है कर उत्तम चिंतन अहंकार दिया कर अव्यवहारिकता का कर प्रतिकार फिर देख जरा कैसे जीवन श्रेष्ठ नहीं बन जाएगा उठो नींद से जागो तुम उठो आलस्यपन को त्यागों तुम।।
लेखक:
भारत दास” कौन्तेय” सतना मध्यप्रदेश

