Thursday, February 26, 2026
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उत्तरप्रदेश में दलितों ने रोकी कलश यात्रा, प्रशाशन,मीडिया और सरकार पर दलित समाज के सवाल।

मूकनायक समाचार जिला एटा उत्तरप्रदेश।

लेखक
संजय सोलंकी

उत्तर प्रदेश: जिले के जैनपुरा गांव में एक अभूतपूर्व घटना ने देश भर में हंगामा खड़ा कर दिया है। दलित समुदाय ने भागवत कथा के लिए निकल रही कलश यात्रा को रोक दिया, जिसके बाद तनाव बढ़ गया और भारी पुलिस बल की तैनाती करनी पड़ी। यह घटना तब सामने आई जब दलित समुदाय ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उनकी अम्बेडकर जयंती शोभायात्रा की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन कलश यात्रा को हरी झंडी दे दी गई।

घटना का विवरण

जानकारी के अनुसार, जैनपुरा गांव में भागवत कथा के लिए निकल रही कलश यात्रा का दलित समुदाय ने विरोध किया। दलित समुदाय का कहना था कि प्रशासन ने 14 अप्रैल को उनकी अम्बेडकर जयंती शोभायात्रा की अनुमति देने से इनकार कर दिया था लेकिन भागवत कथा ओर कलश यात्रा की अनुमति दी जाती है । इसके जवाब में उन्होंने दलित बस्ती से गुजर रही कलश यात्रा को रोक दिया। घंटों तक महिलाएं सिर पर कलश लिए खड़ी रहीं, और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। पुलिस ने दोनों पक्षों से बातचीत कर मामले को शांत किया और यात्रा को सुरक्षा के बीच निकाला गया।

दलित समुदाय का पक्ष

दलित समुदाय के एक सदस्य ने कहा, “जब हमारी बाबासाहेब की रैली ठाकुर समाज के लोगों ने रोकी थी तब पुलिस ओर प्रशासन कहा गए थे ओर पुलिस ओर प्रशासन द्वारा और हमें अनुमति क्यों नहीं दी गई, अगर हमें परमिशन नहीं दी तो इनको कैसे मिल गई इसी को लेकर हमने भी उनकी कलश यात्रा को रोक दिया।

प्रशान का रवैया पक्षपाती?

यह क्रिया की प्रतिक्रिया है।” दलित समुदाय का आरोप है कि प्रशासन पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाता है और उनकी मांगों को लगातार अनदेखा किया जाता है।

मीडिया और सरकार पर सवाल

सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई लोगों ने मुख्यधारा के मीडिया पर दलितों को गलत ठहराने और एकतरफा कवरेज करने का आरोप लगाया है। एक यूजर ने लिखा, “जब दलितों की बारात रोकी जाती है, दलितों को पीटा जाता है,मंदिर में नहीं घुसने दिया जाता,ओर हमारे साथ शोषण और अत्याचार होता हे तब मीडिया और सरकार खामोश रहते हैं। लेकिन जब दलित अपने हक के लिए आवाज उठाते हैं, तो उन्हें गुंडा बता दिया जाता है।

विरोध और प्रतिक्रियाएं।

कुछ लोगों ने इस घटना को दलित समुदाय की बढ़ती जागरूकता और प्रतिरोध का प्रतीक बताया, जबकि अन्य ने इसे ‘उजड़ता’ और ‘गुंडई’ करार दिया। एक पोस्ट में कहा गया, “दलितों ने ठाकुरों की कलश यात्रा रोकी, यह पहली बार है कि ऐसी घटना सामने आई है।” इस घटना ने जातिगत तनाव और सामाजिक समानता के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है।

पुलिस और प्रशासन की भूमिका

पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभाला और दोनों समुदायों के बीच बातचीत कर यात्रा को आगे बढ़ाया। गाँव में शांति बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रशासन ने इस मामले में निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया है, लेकिन दलित समुदाय का कहना है कि उनकी शिकायतों पर हमेशा ध्यान नहीं दिया जाता।

यह घटना प्रशासन और मीडिया की भूमिका पर भी सवाल

जब दलितों की बारात या धार्मिक आयोजनों को रोका जाता है, तब खामोशी क्यों छा जाती है? क्या दलितों का प्रतिरोध अब एक नए दौर की शुरुआत है? यह सवाल समाज और व्यवस्था दोनों के सामने है।

एटा की घटना को देखकर ऐसा लगता है कि दलित समुदाय में अपने हक और सम्मान के लिए प्रतिरोध की भावना मजबूत हो रही है। जब बार-बार उनकी धार्मिक या सांस्कृतिक गतिविधियों, जैसे अम्बेडकर जयंती शोभायात्रा, को रोका जाता है या अनुमति नहीं दी जाती, तो यह स्वाभाविक है कि समुदाय में गुस्सा और प्रतिक्रिया का भाव जागे। जैनपुरा में कलश यात्रा को रोकना इसी का एक उदाहरण हो सकता है, जहाँ दलितों ने अन्याय के खिलाफ खुलकर अपनी आवाज उठाई।यह “क्रिया की प्रतिक्रिया” सामाजिक बदलाव का संकेत हो सकता है, जहाँ दबे-कुचले समुदाय अब चुप रहने के बजाय व्यवस्था के पक्षपातपूर्ण रवैये का जवाब दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर कई लोग इसे दलित जागरूकता और सशक्तिकरण की शुरुआत मान रहे हैं।

किसी की धार्मिक भावना को आहत करना या भड़काना संविधान इजाजत नहीं देता ।

हालांकि, यह भी सच है कि ऐसी घटनाओं से जातिगत तनाव बढ़ सकता है, और इसका समाधान तभी संभव है जब प्रशासन निष्पक्ष होकर सभी समुदायों को समान अवसर दे।

दलितों और शोषित समाज को ही क्यों नहीं मिलती परमिशन क्या हे पूरा मामला।

यह सवाल गंभीर और संवेदनशील मुद्दे की ओर इशारा करता है। जब दलितों की बारात या उनके धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों को रोका जाता है, तो अक्सर प्रशासन और सरकार की चुप्पी या निष्क्रियता सवालों के घेरे में आती है। ऐसी घटनाओं में कुछ बिंदु सामने आते हैं:प्रशासन की निष्क्रियता: कई मामलों में, जब दलितों की बारात या शोभायात्रा रोकी जाती है, तो स्थानीय प्रशासन त्वरित कार्रवाई करने में विफल रहता है। अनुमति देने में आनाकानी, सुरक्षा व्यवस्था की कमी, या प्रभावशाली समूहों के दबाव में चुप्पी साधना आम शिकायतें हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसी घटनाओं की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं, जहाँ दलित दूल्हों को घोड़ी चढ़ने से रोका गया या बारात पर पथराव हुआ।सरकार का रवैया: सरकार, चाहे वह राज्य स्तर की हो या केंद्र की, अक्सर ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेने में कमी दिखाती है। इन मामलों में कठोर कानूनी कार्रवाई या नीतिगत सुधारों की कमी देखी जाती है। दलित समुदाय का आरोप रहता है कि सरकार और प्रशासन प्रभावशाली जातियों के दबाव में काम करते हैं, जिससे उनके अधिकारों का हनन होता है।मीडिया की भूमिका: जैसा कि आपने पहले कहा, “भांड मीडिया” अक्सर ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज कर देता है या फिर दलितों को ही गलत ठहराने की कोशिश करता है। जब दलितों की बारात रोकी जाती है, तो यह खबरें मुख्यधारा के मीडिया में उतनी तवज्जो नहीं पातीं, जितनी कि अन्य मुद्दों को मिलती है। लेकिन जब दलित प्रतिरोध करते हैं, जैसे एटा में कलश यात्रा रोकने की घटना, तो मीडिया इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकता है।सामाजिक व प्रशासनिक भेदभाव: दलित समुदाय के साथ होने वाला यह भेदभाव गहरे सामाजिक पूर्वाग्रहों को दर्शाता है। प्रशासन और पुलिस, जो समाज का हिस्सा हैं, कई बार इन पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकते हैं, जिसके चलते दलितों के साथ हो रहे अन्याय पर त्वरित कार्रवाई नहीं होती।क्या हो रहा बदलाव?
एटा की घटना, जहाँ दलितों ने कलश यात्रा रोकी, यह दर्शाती है कि समुदाय अब अपने खिलाफ होने वाले अन्याय को चुपचाप सहन करने के मूड में नहीं है। यह एक तरह से “क्रिया की प्रतिक्रिया” है, जैसा कि आपने कहा। लेकिन यह भी सच है कि ऐसी प्रतिक्रियाओं से तनाव बढ़ सकता है, और इसका समाधान तभी संभव है जब प्रशासन निष्पक्ष होकर सभी समुदायों को समान अधिकार दे।समाधान के लिए सुझाव:निष्पक्ष प्रशासन: प्रशासन को चाहिए कि वह सभी समुदायों के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए समान नियम लागू करे और सुरक्षा सुनिश्चित करे।कानूनी कार्रवाई: दलितों के खिलाफ होने वाले भेदभाव पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, जैसे कि एससी/एसटी एक्ट का प्रभावी उपयोग।जागरूकता और संवाद: सामाजिक तनाव को कम करने के लिए समुदायों के बीच संवाद और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।आपके विचार में, इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन को क्या कदम उठाने चाहिए? और क्या आपको लगता है कि समाज में यह जागरूकता बढ़ रही है?

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