मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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शिष्टाचार में ऐसी शक्ति है कि मनुष्य किसी को बिना कुछ दिए-लिए अपने और परायों के सम्मान और आदर का पात्र बन जाता है, परंतु जिनमें शिष्टाचार का अभाव है, ऐसे लोग हर किसी के साथ अशिष्टता का व्यवहार कर बैठते हैं, ऐसे लोगों के घर के आदमी भी उनके अनुकूल नहीं होते। बहुत से लोग शिक्षा और अच्छे फैशन वाले वस्त्रों के प्रयोग को ही सभ्यता और शिष्टाचार का मुख्य अंग समझते हैं, पर यह धारणा गलत है। महंगी और बढ़िया पोशाक पहनने वाला व्यक्ति भी अशिष्ट हो सकता है और गांव का एक हल चलाने वाला अशिक्षित किसान भी शिष्ट कहा जा सकता है। शिष्टाचार अथवा विनम्रतापूर्वक एवं शालीनता पूर्ण आचरण ही वह आभूषण है जो मनुष्य को आदर व सम्मान दिलाता है।
शिष्टाचार हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग है। विनम्रता, सहजता से वार्तालाप, मुस्कराकर जवाब देने की कला प्रत्येक व्यक्ति को मोहित कर लेती है। जो व्यक्ति शिष्टाचार से पेश आते हैं वे बड़ी-बड़ी डिग्रियां न होने पर भी अपने-अपने क्षेत्र में पहचान बना लेते हैं। जिंदगी जिंदगी नहीं, जिम्मेदारी है..! जिसे हम जीते कम है, निभाते ज्यादा है ! उपकार का आभार मानना शिष्टाचार है, किन्तु उपकार को जीवन पर्यन्त याद रखना संस्कार है। अच्छी नसीहतों का असर आज इसलिए नहीं होता क्योंकि लिखने वाले और पढ़ने वाले दोनों ये समझते हैं कि ये दूसरों के लिए है।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

