मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मनुष्य की भावनाएं ही तो उसे इंसान बनाती है । अगर भावनाएं ना हो तो मनुष्य और पेड़ पौधों में क्या अंतर रह जाएगा । मनुष्य सिर्फ खाने और सोने के लिए जिए तो ऐसे जीवन का क्या महत्व है। प्रेम, सम्मान, क्रोध, संतोष, भक्ति, दुख ,सुख, आशा, निराशा और इच्छा आदि की भावनाएं जीवन के लिए बहुत जरूरी है, परंतु इस पर नियंत्रण रखना भी जरूरी है क्योंकि किसी भी भावना की अति भी हानिकारक होती है। किसी विद्वान ने ठीक ही कहा कि ‘भावना ही मनुष्य का जीवन है, भावना ही प्राकृतिक है, भावना ही सत्य और नित्य है।’ मनुष्य का जीवन प्रायः भावनाओं से संचालित होता है। इच्छाएँ और भावनाएँ जिधर उसे बहा ले जाती हैं, उधर ही वह बहता रहता है।
नेत्र केवल दृष्टि प्रदान करते हैं, परंतु हम कँहा क्या देखते हैं, यह हमारे मन की भावना पर निर्भर है । कहते हैं कि सुनने से कई मसलें सुलझ जाते हैं और सुनाने से कई मसलें उलझ जाते हैं। केवल सभी को इकट्ठा रखने की ताकत प्रेम में है और सब को अलग करने की ताकत भ्रम में हैं। भगवान बुद्ध कहते हैं- विचारों को पढ़कर बदलाव नहीं आता है, विचारों पर चलकर ही बदलाव आता है । जेब से अमीर रहो या ना रहो, कोई बात नहीं, परंतु मन से जरुर अमीर रहना, महापुरुषों ने एक बहुत अच्छी बात कही है कि अगर कभी अपनी “दौलत” देखनी हो तो बैंक “बैलेंस” या “तिज़ोरी” की तरफ मत देखो l अपनी “आँख” से एक बूंद “आँसू” गिराकर देखो और अजमाइश करो कि कितने “लोग” इसे “पोंछने” आते हैं..
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

