मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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हम हर रोज़ जो कुछ करते हैं, सोचते हैं । उसका नब्बे फीसदी स्वयं की आदतों का हिस्सा होता है क्योंकि पुराने समय या ज़माने से चली आ रही सोच, विचार, भाव, एहसास या समझ को वर्तमान में भी मानने की चलन या ज़िद्द ‘रूढ़ीवाद’ है । बिना यह जाने की भले ही यह वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल या लाभकारी है या नहीं! जो ऐसा विचार रखता है, वह ‘रूढ़ीवादी’ है और इस प्रकार की सम्पूर्ण धारणा को रखने और मानने वाला व्यक्ति व समाज ‘रूढ़ीवादी विचारधारा’ से ग्रसित है। सामान्यतः यह तथाकथित जाति, धर्म, समाज, पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, कट्टरता या लिंग आदि से ग्रसित हो सकती है। मनुष्य अपनी पुरानी आदतें छोड़ने के बारे में बड़ा ही चयनात्मक होता है क्योंकि सुख देने वाली आदतों को हम बचाए रखना चाहते हैं और जो आदतें दुखी करती हैं, उनसे हम पीछा छुड़ाना चाहते हैं । ये सभी रूढ़ीवादी व परम्परागत आदतें ही हैं ।
रूढ़िवादिता के कई दुष्परिणाम हैं, जिसमें समाज में फैली असमानताएं, जातिगत भेदभाव, मानसिक गुलामी, छुआछूत, मानसिक स्वास्थ्य पर असर, रिश्तों में खटास, शिक्षा में बाधा व भेदभाव, समाज में विभेद, रोज़गार में भेदभाव व अन्य काफी कुरीतियां शामिल हैं। आदतों के संबंध में खास बात यह है कि हम अक्सर अपनी छोटी उम्र में ही इन्हें जाने अंजाने में पाल लेते हैं । धीरे धीरे यही रूढ़िवादी आदतें हमारे मन की गहरी परतों में जड़ें जमा लेती हैं और जब तक हमें इसके खतरे का अहसास होता है, तब तक इसकी जड़ें मजबूत हो चुकी होती है । ऐसे हालात में मानव जीवन के लिए घातक इन आदतों से निजात पाना अत्यंत कठिन हो जाता है जिसके फलस्वरूप रूढ़िवादिता से निपटने के लिए, हमें शिक्षा के ज़रिए बच्चों में आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान, और दृढ़ता पैदा करनी चाहिए ।
लेखक
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

