मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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*इंसान के जीवन में सुख दुख चलते रहते हैं और यह भी निश्चित है कि दुख के बाद सुख की घड़ी अवश्य ही आएगी । जैसे एक मां जब वह अपनी संतान को जन्म देती है तो वह कितने दर्द से गुजरती है वह केवल एक मां ही जानती है परंतु जब उसका बच्चा उसकी बाहों में होता है तो वह उस दर्द को पलभर में ही भूल जाती है । उसे इतनी खुशी का अनुभव होता है । इसी प्रकार एक पिता इतनी मेहनत करके दर बदर की ठोकरें खाकर अपने बच्चों के लिए काम करता है । खुद भूखा रहकर अपने बच्चों का पेट पालता है, अच्छी शिक्षा देकर उनका उज्जवल भविष्य बनाता है और जब उसका बच्चा खुद कमाने योग्य या अपने पिता का हाथ बढ़ाने वाला बनता है तो वह अपने सारे कष्टों को भूल जाता है। "दर्द" भी कितना 'खुशनसीब' है जिसे पाकर लोग अपनों को याद करते हैं और "दौलत" कितनी 'बदनसीब' है जिसे पाकर लोग अपनों को ही भूल जाते हैं ।*
*जहां तक दौलत का संबंध है, अधिकांश दौलत तो इंसान को विरासत में मिलती है, लेकिन उसे पहचान तो अपने दम पर ही बनानी पड़ती है, इस बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि विरासत से मिली दौलत सिर्फ़ एक साधन है । इससे व्यक्ति की पहचान नहीं बनती बल्कि इंसान को अपनी पहचान के लिए खुद ही प्रयास करने होते हैं क्योंकि पहचान उन गुणों और कौशल से बनती है, जो व्यक्ति ने अपने जीवन में अर्जित किए होते हैं । दौलत इतनी तो होनी चाहिए कि दो वक्त की रोटी के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। पैसा कितना भी हो, कम ही लगता है ।लेकिन इंसान की अपनी जरूरत के लिए तो होना चाहिए ताकि बुढ़ापे में बच्चों पर निर्भर न रहना पड़े।*
लेखक
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

