Thursday, February 26, 2026
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डॉ अंबेडकर ने अपने विचारों और संघर्ष से करोड़ों लोगों को शिक्षा, समानता अधिकारों की दिखाई राह

मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अंबेडकर जयंती डॉ. बीआर अंबेडकर के जीवन और योगदान का जश्न मनाती है, जिन्होंने दलितों और हाशिए के समुदायों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। यह भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका और समानता, न्याय और सामाजिक सुधारों के लिए उनके आजीवन संघर्ष का सम्मान करता है । डॉ भीमराव अंबेडकर का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतना का जागरण है। उन्होंने अपने विचारों और संघर्षों से करोड़ों लोगों को शिक्षा, समानता और अधिकारों की राह दिखाई। चाहे वह संविधान निर्माण की बात हो, सामाजिक न्याय की लड़ाई या शिक्षा का महत्व—हर मोर्चे पर उन्होंने बेझिझक अपनी बात रखी। डॉ भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू कस्बे में एक दलित (महार जाति) परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम भीमराव रामजी अंबेडकर था। उनका परिवार सामाजिक रूप से निम्न समझे जाने वाले वर्ग से संबंध रखता था, जिससे उन्हें बचपन से ही सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। स्कूल में उन्हें अलग बैठाया जाता था, पानी छूने की अनुमति नहीं थी, और समाज में हर जगह उनके साथ भेदभाव किया जाता था, लेकिन बालक भीमराव ने इन सब कठिनाइयों को अपने शिक्षा के मार्ग में आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से स्नातक किया और फिर कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, कानून और दर्शनशास्त्र में भी अध्ययन किया। 32 डिग्रियां और 9 भाषाओं के ज्ञाता थे । डॉ. आंबेडकर, 8 साल की पढ़ाई 2 साल 3 महीने में ही पूरी कर ली थी । भारत जैसे ग़रीब व ग़ैर-बराबरी वाले देश में संविधान के ज़रिए छुआछूत ख़त्म करना, वंचितों के लिए सकारात्मक उपाय करना, सभी वयस्कों को मतदान का अधिकार देना और सबके लिए समान अधिकार तय करना, बहुत बड़ी उपलब्धि थी ।
डॉ अंबेडकर का राजनीतिक जीवन 1920 के दशक में शुरू हुआ था। उन्होंने 1924 में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ नामक संगठन की स्थापना की थी, जो दलितों के सामाजिक उत्थान के लिए काम करता था । जातिप्रथा और छुआ-छूत के मुद्दों पर गांधी जी और अम्बेडकर के बीच मतभेद विद्यमान थे । गांधी जी का मानना था कि जाति व्यवस्था से केवल छुआ-छूत जैसे अभिशाप को बाहर करना चाहिए, तो वहीं अम्बेडकर पूरी जाति व्यवस्था को खत्म करने के पक्ष में थे। इसी मतभेद को लेकर अंबेडकर ने क्षेत्रीय विधान सभाओं और केंद्रीय विधान परिषद में एक अलग निर्वाचक मंडल की मांग की। वर्ष 1932 में पूना पैक्ट (महात्मा गांधी और अंबेडकर के मध्य) हुआ, जिसमें अलग निर्वाचक मंडल के बजाय दलित वर्ग के लिए आरक्षित सीटों का प्रावधान किया गया। 13 अक्टूबर 1935 को नासिक के निकट येवला में एक सम्मेलन में बोलते हुए अंबेडकर ने बौद्ध धर्म में अपना धर्म परिवर्तन करने की घोषणा की और कहा, “हालाँकि मैं एक अछूत हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूँ, लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में हरगिज नहीं मरूँगा “, 1936 में, उन्होंने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 के चुनावों में कुछ सफलता प्राप्त करने में सफल रही । डॉ आंबेडकर सन 1948 मधुमेह से पीड़ित थे । दवाइयों के दुष्प्रभाव और खराब दृष्टि के कारण उन्हें जून से अक्टूबर जून 1954 तक बिस्तर पर रखा गया था । सन 1955 के दौरान उनकी तबीयत खराब हो गई थी. अपनी अंतिम पांडुलिपि ‘बुद्ध और उनके धम्म’ को पूरा करने के तीन दिन बाद, अंबेडकर की 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में उनके घर पर नींद में ही मृत्यु हो गई थी । सन 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था। 14 अप्रैल को उनका जन्म दिवस अम्बेडकर जयंती के तौर पर भारत समेत दुनिया भर में मनाया जाता है। डॉ भीमराव अम्बेडकर आज पूरे विश्व में प्रेरणा के मसीहा बने हुए हैं।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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