दिनांक 15 मार्च 2022 को, बाली से अपने गांव बालवा लौटते समय 28 वर्षीय जितेंद्र मेघवाल पर रास्ते में जानलेवा हमला किया गया था। उनके साथ मौजूद साथी हरीश कुमार के अनुसार, बारवा निवासी सूरज सिंह और रमेश सिंह राजपुरोहित ने पीछा कर धारदार हथियारों से हमला किया। शरीर पर 23 गंभीर वार किए गए, जिनमें कंधे, छाती, जबड़ा और पेट शामिल थे। गंभीर हालत में अस्पताल ले जाने पर इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
हत्या का कारण – पुलिस और सोशल मीडिया में मतभेद
हत्या के बाद सोशल मीडिया पर यह खबर फैल गई कि हत्या का कारण जितेंद्र की मूंछों पर ताव देना, उसका आत्मविश्वासपूर्ण व्यक्तित्व, और दलित समुदाय से होने के बावजूद सम्मान से जीना था। यह खबर देशभर में वायरल हुई और जातीय घृणा पर आधारित हिंसा के खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया देखी गई। हालांकि, राजस्थान पुलिस ने मामले की जांच के बाद बताया कि हत्या का मुख्य कारण 2020 में हुआ एक पुराना व्यक्तिगत विवाद था, जिसमें जितेंद्र ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। पुलिस ने इसे जातीय अभिमान के बजाय पूर्व विवाद से जुड़ा प्रतिशोध करार दिया।
जमानत याचिका खारिज – अदालत का रुख सख्त
आरोपी रमेश सिंह राजपुरोहित ने तीसरी बार जमानत याचिका लगाई थी, जिसे माननीय विशेष न्यायालय (SC/ST Act), पाली ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने यह माना कि मामले की गंभीरता, गवाहों पर प्रभाव डालने की आशंका, और सामाजिक तनाव को देखते हुए आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती।
गवाहों पर दबाव और सामाजिक संघर्ष
सूत्रों के अनुसार, आरोपी पक्ष और स्थानीय प्रभावशाली समुदाय द्वारा गवाहों पर दबाव बनाने और बयान बदलवाने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। लेकिन विशेष लोक अभियोजक श्री के.आर. सोलंकी, और परिवादी पक्ष के अधिवक्ता श्री के.एल. चौहान और गणपत सिंह की सशक्त पैरवी के चलते अब तक मुख्य गवाह सहित 8 गवाहों के बयान मज़बूती से न्यायालय में दर्ज हो चुके हैं।
जातीय अन्याय के विरुद्ध एकजुटता
इस केस ने पूरे राजस्थान ही नहीं, देशभर के बहुजन समाज, दलित संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को झकझोर कर रख दिया। जितेंद्र मेघवाल अब केवल एक नाम नहीं, बल्कि दलित स्वाभिमान का प्रतीक बन चुके हैं। गांव को एक समय छावनी में तब्दील करना पड़ा और पीड़ित परिवार को हथियार लाइसेंस तक जारी किए गए।
सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में न्याय का संघर्ष
यह मामला राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मौजूद छिपे हुए जातीय वर्चस्व, सामाजिक असमानता और दलितों के खिलाफ हिंसा को उजागर करता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य में पिछले 5 वर्षों में 56,000 से अधिक जातीय अपराध दर्ज हुए हैं, लेकिन दोषसिद्धि दर चिंताजनक रूप से कम है।
निष्कर्ष: ‘सत्यमेव जयते’ की दिशा में एक और कदम
जितेंद्र मेघवाल हत्याकांड में आरोपी की तीसरी जमानत याचिका का खारिज होना केवल कानूनी सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई में एक प्रेरणादायक अध्याय है। बहुजन समाज की एकता, साहस और संवैधानिक विश्वास ने यह सिद्ध कर दिया है कि अन्याय के विरुद्ध संगठित संघर्ष ही सबसे बड़ा हथियार है।





