मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍🏻✍🏻
*जीत और हार आपकी सोच पर निर्भर करती है। मान लो तो हार होगी और ठान लो तो जीत।” अपनी मंजिल पर पहुंचने से पहले अगर हम हार मान ले रहे हैं, तो हम सचमुच हार गए। लेकिन अपनी मंजिल के लिए जब जूझते हैं, बार-बार गिर कर खड़े होते हैं तो हमारा आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। इसके बाद जब मंजिल मिलती है, तो उसकी खुशी कई गुना होती है। इसलिए आपकी जीत या हार को कोई और तय नहीं कर सकता है। यह खुद आपके ऊपर निर्भर करता है। वहीं इंसान की जिंदगी की हार जीत का फैसला उसकी औलाद भी करती है, अगर संस्कारी और कमाऊ है तो जीत है, अगर औलाद बेकार और आवारा है तो करोड़ों की कमाई हुई पूंजी होते हुए भी हार है । बुद्धि सब के पास है, चालाकी करनी या ईमानदारी, वो संस्कारों पर निर्भर करता है ।
सफल व्यक्ति हार से कभी नहीं घबराते, बल्कि मंजिल की ओर बढ़ते हुए मार्ग में आने वाले असफलता रुपी कांटे व्यक्ति को निडर और साहसी बनाते हैं। हार का सामना करना संघर्ष की बहादुरी का परिचय कराता है। यह हमें असफलता का सामना करने की क्षमता देता है, हमें मजबूत और सही दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। जीत की असली खुशी का इजहार वही कर सकता है जिसने हार का स्वाद देखा हो। यदि प्रयास के बिना सफलता मिलती रहती है तो सफलता का महत्व और आनंद दोनों ही खत्म हो जाते हैं। यह याद रखना कि चालाकी चार दिन चमकती है और ईमानदारी जिंदगी भर की निकटता बनाये रखती है । जरुरतों के हिसाब से लोगों से जुड़े रहना एक सामान्य व्यवहार होता है लेकिन जरुरत के बगैर भी लोगों का ख्याल रखना एक अच्छे व्यक्तित्व की पहचान है ।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

