मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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🖊️महाराष्ट्र > जिला रत्नागिरी > तालुका दापोली > ग्राम पंचले > पन्हालेकाजी बौद्ध गुफाएं
ジャラサンダ塚 > アサンド
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✒️𝗚𝗘𝗡𝗘𝗥𝗔𝗟 𝗜𝗡𝗙𝗢𝗥𝗠𝗔𝗧𝗜𝗢𝗡 महाराष्ट्र के जिला रत्नागिरी के दापोली तालुका के पंचले गांव में पन्हालेकाजी बौद्ध गुफाएं है। यह गुफाएं कुल 29 है जिनमें से 28 कोर्टजय नदी के दाहिनी किनारे पर स्थित है। यह मुख्य रूप से बौद्ध गुफाएं हैं। वर्तमान में इन बौद्ध गुफाओं में कुछ हिंदू देवी देवताओं को भी स्थापित कर दिया गया है। हीनयान संप्रदाय ने तीसरी शताब्दी ईस्वी में गुफाओं की नक्काशी शुरू की जिसकी शुरुआत गुफा संख्या 5 में स्तूप से हुई थी। गुफाओं में ब्राह्मी और देवनागरी लिपि में शिलालेख है। 10वीं 11वीं शताब्दी ईस्वी से एक अन्य बौद्ध समूह वज्रयान संप्रदाय ने अपने देवताओं अशोक और महाचंद्ररोशन के साथ गुफा 10 की स्थापना की थी।
👉🏻𝗡𝗘𝗔𝗥𝗘𝗦𝗧 𝗣𝗟𝗔𝗖𝗘 इन गुफाओं का रत्नागिरी जिला स्थल निकट है और
दापोली तालुका से इसकी दूरी लगभग 40 किमी दूर है। मुंबई से लगभग 220 किमी वहीं पुणे से यह स्थान 185 किमी दूर है निकट रेलवे स्टेशन खेड़ है।
👉🏻𝗚𝗘𝗢𝗚𝗥𝗔𝗣𝗛𝗜𝗖𝗔𝗟 𝗦𝗖𝗘𝗡𝗔𝗥𝗜𝗢 पन्हालेकाजी गुफा परिसर उनके शांत आकर्षण को और बढ़ा देते हैं ।इन गुफाओं में जाने से प्राचीन वास्तु कला का एक अनूठा अनुभव मिलता है। इसमें जटिल नक्काशी मूर्ति या , स्तूप है जो सदियों की शिल्प कला और भक्ति को दर्शाते हैं।
👉🏻𝗛𝗜𝗦𝗧𝗢𝗥𝗬 यह गुफाएं तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की बनी हुई है जो भारत के प्राचीन इतिहास और धार्मिक विविधता का यह एक समृद्ध चित्रण प्रस्तुत करती है। छठवीं और सातवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में चालूक्या वंश का प्रभाव बढ़ने लगा। चालुक्य वंश के शासक शेव थे। इसलिए इन गुफाओं में कहीं-कहीं शिव प्रतिमाएं स्थापित हो चुकी थी। आठवीं शताब्दी की शुरुआत में चालुक्य वंश का प्रभाव कम हो गया और बौद्ध धर्म में तांत्रिक वज्रयान संप्रदायों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। यह प्रभुत्व 11वीं शताब्दी तक रहा नतीजा वज्रयान संप्रदायों द्वारा हीनयान गुफाओं की स्थापत्य विशेषताओं को बदल दिया गया।
👉🏻𝗗𝗜𝗦𝗖𝗢𝗩𝗘𝗥𝗘𝗥 सन 1972 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में इस साइट की खुदाई की और कोर्टजै नदी के पास पूरी तरह से छिपी हुई 29 गुफाओं का एक समूह मिला। प्रख्यात पुरातत्व M N देशपांडे ने इन गुफाओं का अध्ययन किया और शोध प्रबंधक द केव ऑफ पन्हालेकाजी लिखा। इस शोध प्रबंध के लिए उन्हें 1986 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ वेस्ट बंगाल बेस्ट वर्किंग मॉडल से सम्मानित भी किया गया। उन्होंने इन गुफाओं के बारे में पूरे महाराष्ट्र में व्याख्यान दिया।
👉🏻𝗛𝗜𝗦𝗧𝗢𝗥𝗜𝗖𝗔𝗟 𝗜𝗠𝗣𝗢𝗥𝗧𝗔𝗡𝗖𝗘 सातवाहन वंश के दौरान कोकण में हीनयान बौद्ध संप्रदाय फैल गया। कोकण में कई विहार संघ राम और चैत्य ग्रह स्थापित हुए। इन गुफाओं की पश्चिम दिशा की एक दीवार पर एक ब्राह्मी शिलालेख बना है लेकिन उत्तर में इसे छेनी से इतना खरोच दिया गया है कि इसमें केवल कुछ अक्षर बिना संदर्भ के दिखाई देते हैं इन अक्षरों से यह माना जा सकता है कि यह लेख दूसरी तीसरी शताब्दी का रहा होगा।
👉🏻𝗖𝗢𝗡𝗦𝗧𝗥𝗨𝗖𝗧𝗜𝗢𝗡 𝗔𝗡𝗗 𝗙𝗘𝗔𝗧𝗨𝗥𝗘
गुफा संख्या 1-2 और 3,,,, इस समूह की गुफा संख्या 2 की खुदाई विहार के रूप में की गई। इस गुफा में मंडप की छत 16 चौराहों से बनी है। जिसके मध्य में ऊंची कियारियां बनी हुई है और एक दूसरे को समकोण पर काटती है। इन विशेषताओं के आधार पर स्पष्ट होता है किगुफाएं मूल रूप से तीसरी या दूसरी शताब्दी की बनी है। लेकिन दसवीं शताब्दी में इसका कुछ स्वरूप बदल गया। इन मूर्तियों के आभूषण को खरोच कर इसे सरल बना दिया गया था।
इस से पता चलता है कि यह गुफाएं तांत्रिक वज्रयान संप्रदाय द्वारा बनाई गई थी।
गुफा संख्या 7 से 9,,,,, भिक्षुओं के घर थे लेकिन पीछे की दीवार में एक आला और एक गर्भ ग्रह खोदा गया था और इसमें कई तकनीकी मूर्ति स्थापित की गई थी। स्तूप को गुफा संख्या 5 और 6 की संख्या वाली गुफाओं की छत पर रखा गया है कुछ ऐसे संकेत पाए जाते हैं और वह कुछ स्तूप पड़े हुए हैं उसे ऐसा लगता है कि 5 और 7 की संख्या वाली गुफाओं पर एक स्तूप और होना चाहिए था।
गुफा संख्या 10 से 13,,,
में खुदाई की गई इन स्तंभों को एक चौकोर आधार दिया गया है लेकिन फिर भी वह पैरापेट से अभिन्न है। मंडप की पिछले दीवार पर तीन भिक्षुओं के घरों के बीच में मठ का उपयोग और अशोक की मूर्ति की स्थापना प्रतीत होती है तकनीकी बजरंग संप्रदाय की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण गुफा संख्या 10 है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस गुफा में महाचंद्र सेन की एक मूर्ति है जो हाथियों और शेरों के साथ शब्द्दर्शी पीठ पर स्थित है उसके पत्थर में ऊपरी गई छबिया बहुत दुर्लभ है। यहां की शैली बताती है कि अक्षय की मूर्तियां नवी और दसवीं शताब्दी में रही होगी। गुफा संख्या 14 से 18 इनका उपयोग नाथ संप्रदाय द्वारा वज्रयान का वर्चस्व समाप्त होने के बाद किया गया था। पन्हालेकाजी गुफाओं पर नाथ संप्रदाय का केंद्र संभवत 13वीं या 14वीं शताब्दी में बनाया गया था। इस गुफा के प्रांगण में सिद्ध पादुकाओं को एक चौकोर पत्थर पर उगेरा गया है प्रवेश द्वार के दोनों और कुल 12 मूर्तियां है।
गुफा 17 और 18 भी वज्रयान संप्रदाय की गुफाएं है। गुफा संख्या 19 से 23 समूह 19 से 23 शीलहरों से जुड़ा है। सिलहर काल के दौरान पांचालजीत में विशेष महत्वपूर्ण कार्य किया गया था। यह केवल इस समूह में दिखाई देता है। हालांकि 19वीं गुफा को पहले शुरू किया गया था लेकिन इसे 11वीं शताब्दी में एक अखंड सिलहर शैली के मंदिर के रूप में मनाया गया था। इस मंदिर के स्तंभ सिलहर काल के हैं और गर्भ ग्रह एकस्मआ है इसमें शिवलिंग स्थापित किया गया है। गर्भ ग्रह एक वृताकार पद से घेरा है। इसकी पिछली दीवार पर दोनों तरफ उत्तर की ओर अंतरिक्ष में एक दूसरे का सामना कर रहे चित्रकारि कि है। इससे ऐसा लगता है कि इस मंदिर की योजना एक पंचायत के रूप में बनाई गई थी मूर्तियां और उल्टे कमल के आभूषण सभा मंडप के स्थान मंदिर की छत के केंद्र है। मंदिर के छत पर नो मूर्तियां है। यह गुफाएं मूल रूप से एक मैथ के रूप में बनाई गई थी इसका उपयोग भी वज्रयान संप्रदाय द्वारा किया जाता था लेकिन वर्तमान में यहां पर हिंदू देवी देवताओं को स्थापित किया जा चुका है।
👉🏻𝗖𝗨𝗥𝗥𝗘𝗡𝗧 𝗦𝗖𝗘𝗡𝗔𝗥𝗜𝗢 पन्हालेकाजी गुफाएं एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्थल है जो अपनी सुंदर वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए जानी जाती है लेकिन वर्तमान में सुरक्षा के लिए उम्मीद अपेक्षित है। सरकार को यहां ध्यान देने की आवश्यकता है यहां अभी तक किसी प्रकार का कोई सरकारी बोर्ड तक नहीं लगा है।
👉🏻𝗙𝗨𝗧𝗨𝗥𝗘 इन गुफाओं का भविष्य संरक्षण और सुरक्षा पर निर्भर करता है महाराष्ट्र सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा इन गुफाओं के संरक्षण विकास के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किय जा रहे हैं। अभी बहुत कुछ काम करना बाकी है। इन गुफाओं को और अधिक सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि स्थानीय समुदाय सरकार और पर्यावरणविद् तथा पुरातत्वविद् मिलकर काम करें ताकि इन गुफाओं की सुंदरता, ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को सुरक्षित किया जा सके।
✍🏻𝗖𝗼𝗺𝗽𝗶𝗹𝗲𝗱 𝗯𝘆 𝗥𝗣𝗗𝗦 𝗡𝗔𝗥𝗘𝗡𝗗𝗥𝗔 𝗠𝗘𝗦𝗛𝗥𝗔𝗠

