Thursday, February 26, 2026
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सद्संस्कार ही हैँ इंसान की अमूल्य धरोहर और उच्च संस्कार ही बनाते हैं मानव को महामानव

मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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परिवार समाज की एक इकाई है। परिवारों से मिलकर ही समाज का निर्माण होता है। अगर परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ व खुशहाल होंगे, तो समाज भी खुशहाल होगा। पारिवारिक सुख और शांति के लिए परिवार के सदस्यों के मध्य आपसी स्नेह, विश्वास और सम्मान आवश्यक है। अगर परिवार के सदस्य आपस में प्रेम से रहेंगे, मेलजोल से रहेंगे तो परिवार में भी सुख व शांति का वास होगा। वस्तुत: सुखद पारिवारिक जीवन के लिए अच्छे संस्कारों और सहिष्णुता का होना जरूरी है। परिवार के सदस्यों में आम तौर पर सहनशीलता का अभाव होता जा रहा है। पत्‍‌नी, मां-बेटे, मां-बेटी, भाई-भाई, भाई-बहन, सास-बहू और गुरु-शिष्य के संबंधों में सहनशीलता कम होती जा रही है। समाज व परिवार में यह आम देखने को मिलता है कि एक व्यक्ति अपने भाई को सहन नहीं करता, माता-पिता को सहन नहीं करता ।
यहां यह प्रकृति की विचित्रता ही है कि इंसान परिजनों की बजाय पड़ोसी को सहन कर लेता है, अपने मित्र को सहन कर लेता है। सहन करना अच्छी बात है, लेकिन घर में भी एक सीमा तक एक-दूसरे को सहन करना चाहिए, तभी छोटी-छोटी बातों को लेकर मनमुटाव व नित्य होने वाले विवाद नहीं होंगे। प्रत्येक इंसान की पहचान उसके संस्कारों से होती है। संस्कार उसके समूचे जीवन को व्याख्यायित करते हैं। संस्कार हमारी जीवनी शक्ति हैं। संस्कार निरंतर जलने वाली ऐसी दीपशिखा है जो जीवन के अंधेरे मोड़ों पर भी प्रकाश की किरणें बिखेर देती है। उच्च संस्कार ही मानव को महामानव बनाते हैं। सद्संस्कार अमूल्य संपदा हैं, जिनके आगे संसार के धन-दौलत का कुछ भी मोल नहीं है। सद्संस्कार मनुष्य की अमूल्य धरोहर हैं। परिवार के जिन सदस्यों के पास संस्कार व सहनशीलता रूपी धन है, उस परिवार के सदस्य सुख-शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं। जब अधिकतर परिवार सुख शांतिपूर्ण जीवन जिएंगे, तभी समाज में सुख-शांति कायम होगा ।
लेखक
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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