मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍🏻✍🏻
जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को प्रशंसक और निंदक मिलते रहते हैं। आपकी कोई प्रशंसा करे या निंदा, दोनों को सहजता से स्वीकार करना चाहिए क्योंकि प्रशंसा जहाँ प्रेरणा देती है, वही निंदा सावधान होने का अवसर देती है। सदैव दूसरों में दोष ढूंढते रहना मानवीय स्वभाव का एक बड़ा अवगुण है। दूसरों में दोष निकालना और खुद को श्रेष्ठ बताना कुछ लोगों का स्वभाव होता है। निंदा करने से हमारे मन में अशांति व्याप्त होती है और हम हमारा जीवन दुःखों, कष्टों , परेशानियों से भर लेते हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य का अपना अलग दृष्टिकोण एवं स्वभाव होता है। दूसरों के विषय में कोई अपनी कुछ भी धारणा बना सकता है। अतः निंदा और प्रशंसा दोनों ही जीवन के महत्वपूर्ण और अहम् पहलू हैं।
कवि कबीर दास एक महान संत थे, उन्होंने भी निंदा के बारे में गंभीर बात कही है। उन्होंने कहा था कि -‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।’ इसका तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति हमारी निंदा करता है, हर समय हमारे भीतर कमियां तलाशता है, उसे हमेशा अपने पास रखना चाहिये क्योंकि एक वही व्यक्ति है, जो बिना साबुन या बिना पानी के हमारे स्वभाव को निर्मल बना सकता है। मतलब यह है कि वह व्यक्ति हमारे भीतर की हर कमी को दूर कर सकता है। जब कोई व्यक्ति हमें हमारी कमियां नहीं बताएगा तो हमारे स्वभाव में सुधार कैसे संभव हो सकता है ? इस दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं, जो कीचड़ में खिले हुए कमल की सुंदरता देखते हैं.। वहीं दूसरे ऐसे लोग भी होते हैं, जो सुंदर शीतल चाँद में भी दाग देखते हैं.! इसलिए जीवन में हमेशा प्रशंसक बनने का प्रयत्न करें, निंदक नहीं क्योंकि प्रशंसा हमेशा सकारात्मक ऊर्जा को जन्म देती है और निन्दा हमें नकारात्मक सोच की ओर ले जाती है.!! .
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

