मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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स्वाभिमान शब्द भी स्व+अभिमान के संयोजन से बना है। परन्तु जब इनके अर्थ की बात आती है तो, दोनों ही शब्द एक दूसरे के विलोम जैसे प्रतीत होते हैं। जहाँ अभिमान नकारात्मकता का द्योतक है, वहीं स्वाभिमान सकारात्मक का प्रतीक है। दोनों की प्रकृति में जमीन आसमान का अंतर होता है। अभिमान जहाँ बने बनाए काम को बिगाड़ सकता है, वहीं स्वाभिमान व्यक्ति के सम्मान को स्थापित करता है। स्वाभिमान का मतलब अपनी बात पर अड़े रहना नहीं, अपितु सत्य का साथ ना छोड़ना है। दूसरों को नीचा दिखाते हुए अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रयास करना यह स्वाभिमानी का लक्षण नहीं, अपितु दूसरों की बात का यथायोग्य सम्मान देते हुए किसी भी दबाब में ना आकर सत्य पर अडिग रहना यह स्वाभिमान है..,
इनके विपरीत अहंकार में चूर लोग खुद तो डूबते ही है, अपने साथियों को भी डूबाने का अपराध करते हैं। वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि ‘घमण्डी का सिर नीचा’ ही होता है। अहंवादी व्यक्ति कभी किसी का प्रिय नहीं बन सकता। उसका स्वयं को सबसे विशेष मानना ही इसका प्रमुख कारण है। इसलिए वह सबके साथ मिल जुलकर नहीं रह सकता। अभिमानी वह है, जो अपने अहंकार के पोषण के लिए दूसरों को कष्ट देना पसंद करता है। मैं जो कह रहा हूँ – वही सत्य है, यह अभिमानी का लक्षण है और जो सत्य होगा.. मैं उसे स्वीकार कर लूँगा। यह स्वाभिमानी का लक्षण है। अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझना, दूसरों के सम्मान की अनदेखी करना, अपने धर्म, जाति , वंश, पद, प्रतिष्ठा, धन-वैभव, ऐश्वर्य का गर्व करना आदि सभी अभिमानी होने के ही लक्षण हैं | अपने आत्म गौरव की प्रतिष्ठा जरुर बनी रहनी चाहिए, मगर किसी को अकारण, अनावश्यक झुकाकर, गिराकर या रुलाकर नहीं।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

