Thursday, February 26, 2026
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क्रोध, नाराजगी, ईर्ष्या और घृणा को जीता जा सकता है निश्चल निस्वार्थ प्रेम से

मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जो बात प्रेम से समझाई जा सकती है, उसके लिए तैश खाना वैसी ही नासमझी है, जैसे सुई से निपटने वाले काम के लिए तलवार चलाना । क्रोध आने का प्रमुख कारण व्यक्तिगत या सामाजिक अवमानना है। उपेक्षित तिरस्कृत और अहंकारी समझे जाने वाले लोग अधिक क्रोध करते हैं क्योंकि वे क्रोध जैसी नकारात्मक गतिविधि के द्वारा भी समाज को दिखाना चाहते है कि उनका भी बहुत बड़ा अस्तित्व है। क्रोध का ध्येय किसी व्यक्ति विशेष या समाज से प्रेम की अपेक्षा करना भी होता है । क्रोध शांति भंग करने वाला एक मनोविकार है, जिस पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक होता है। कहते हैं कि एक बार क्रोध करने से दिमाग की 10,000 ज्ञान-कोशिकाएं जलकर नष्ट हो जाती है और इस स्थिति में क्रोध, नाराजगी, ईर्ष्या और घृणा आदि को निष्छल निस्वार्थ प्रेम से ही जीता जा सकता है ।
वहीं असली प्रेम वह होता है जिसमें किसी से बिना शर्त और बिना किसी स्वार्थ के प्यार किया जाए क्योंकि प्यार या प्रेम एक एहसास है, जो दिमाग से नहीं, दिल से होता है और इसमें अनेक भावनाओं व अलग अलग विचारों का समावेश होता है। प्रेम स्नेह से लेकर खुशी की ओर धीरे धीरे अग्रसर करता है। ये एक मज़बूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना है जो सब-कुछ भूलकर उसके साथ जाने के लिए प्रेरित करता है । इसलिए संकल्प लीजिए कि आप सभी धैर्य और शांति रख कर अपनी ज्ञान-कोशिकाओं का पोषण करेंगे, ना कि क्रोध और विकारों के द्वारा उनका शोषण। हो सके तो स्वयं को माचिस की तीली ना बनाएं, जो थोड़ा-सा घर्षण लगते ही सुलग उठे। स्वयं को शांत सरोवर बनाएं जिसमें कोई अंगारा फेंके तो वह खुद ही बुझ जाए ।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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