मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो कुछ सामाजिक बंधनों और रिश्तों की सुनहरी डोर से बंधा हुआ है। व्यक्ति संपूर्ण जीवन व्यस्त रहता है, इन सबसे कुछ राहत पाने तथा कुछ समय हर्षोल्लास के साथ, बिना किसी तनाव के व्यतीत करने के लिये ही मुख्यतः पर्व एवं त्योहार मनाने का प्रचलन हुआ। उत्साह के बिना जीवन निरस हो जाता है, इसीलिए हमेशा प्रसन्न और संतुष्ट रहें । जीवन का आनंद हर लड़ाई जीतने में नहीं, बल्कि उससे बचना भी सबसे बड़ी कला है ! कुशलतापूर्वक पीछे हट जाना भी अपने आप में एक बड़ी जीत होती है !
जन-मन में आस्था और विश्वास जगाने की आज बेहद जरूरत है। केवल होलिकादहन के नाम पर घास-फूस को ही जलाने की बजाय मानव समाज की उन तमाम बुराइयों का भी दहन करें, जो हमारे भीतर अलगाव और आतंक को फैला रही हैं। दरअसल, असली पर्व तो तब मनेगा, जब हमारे देश के राजनेता अपने चेहरों पर लगे बेईमानी, स्वार्थ और रिश्वतखोरी के रंगों को उतारकर भ्रष्टाचार की होली का दहन करेंगे। तब तक तो देश में आम आदमी का हर पर्व सूखा ही है। किसी ने क्या खूब कहा है :-
‘वक्त बदल गया है, हालात बदल गए । खून का रंग नहीं बदला, पर खून के कतरे बदल गए।’
‘दिन-रात नहीं बदले, मगर मौसम बदल गए/होली तो वही है, पर होली के रंग बदल गए।’
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

