मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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कई बार इंसान बिना किसी वजह अपने आप को इतना गिरा देता है कि वह सारी मान मर्यादा व बोलने की गरिमा भूल जाता है, व अपनी ही नजरो में गिर जाता है । मर्यादा में रहने वाला इंसान कोई भी ज़िम्मेदारी कबूल करने से पहले, यह जानने की कोशिश करता है कि उससे क्या करने की उम्मीद की जा रही है? वह इस बारे में प्रार्थना करता है और ध्यान से सोचता है कि क्या वह यह काम कर पाएगा। क्या उसके पास दूसरी ज़रूरी बातों के लिए समय और ताकत बचेगी? अगर नहीं, तो जो काम वह अभी कर रहा है, क्या उसमें से कुछ काम दूसरे कर सकते हैं? इस बारे में सोचने के बाद, मर्यादा में रहने वाला इंसान शायद यह फैसला करे कि वह इस नयी ज़िम्मेदारी को ठीक से नहीं निभा पाएगा। उसी तरह, अगर हम अपनी मर्यादा जानते हैं तो हमें शायद किसी नयी ज़िम्मेदारी के लिए ना कहना पड़े।
इंसान के सुखमय जीवन जीने के लिए ही मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखाएं निर्धारित की जाती हैं। उन रेखाओं का हम जब भी अतिक्रमण करते हैं, तब-तब हमारे अस्तित्व का अपहरण ही होता है। जैसे कि- जीवन की मर्यादा, कुल की मर्यादा, समाज की मर्यादा, देश और संस्कृति की मर्यादा, मर्यादा बंधन नहीं, अपितु निर्मल और व्यवस्थित जीवन जीने की शैली है । समुद्र बड़ा होता है और बांध छोटा, परंतु जब तक समुद्र मर्यादा में है, तब तक उससे कोई खतरा नहीं है, परंतु बांध छोटा होकर भी अगर मर्यादा तोड़ बैठे तो बड़ी तबाही ले आता है । मर्यादापूर्वक जीवन जिएंगे तो हजार दुविधाओं से बचें रहेंगे क्योंकि मान मर्यादा का पालन करना ही श्रेष्ठ मानव का गुण है ।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

