मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
बहुजनों के मसीहा, बहुजन नायक, क्रांतिकारी महान तपॅस्वी, महान त्यागी, बहुजनों के मार्ग दर्शक और वैज्ञानिक से बने समाजिक वैज्ञानी मान्यवर साहिब श्री कांशीराम जी के त्याग और संघर्ष भरे जीवन की दास्तान हम आपके साथ सांझा करते हैं।
सन 1987 की बात है। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. डी. तिवारी को हटाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उसे विदेश मंत्रालय दे दिया तो तिवारी की विधानसभा वाली कांशीपुर सीट (उस वक्त जिला रुद्रपुर और आजकल जिला सरदार उधम सिंह नगर, उत्तराखंड) खाली हो गई। तिवारी की जगह पर उस समय राजीव गांधी ने ठाकुर वीर प्रताप सिंह को मुख्यमंत्री बनाया था। खाली हुई सीट पर मार्च में हो रहे उपचुनावों के संबंध में 78 जातियों के प्रतिनिधि साहेब कांशी राम को इलाहाबाद में मिले और कहने लगे कि हमारा वोट 26 प्रतिशत है लेकिन हमें कोई भी पार्टी टिकट नहीं देती। टिकट माँगों तो कह देते हैं कि आपका वोट कितना है? अब एन. डी. तिवारी केन्द्रीय मंत्रालय में चला गया है और कांग्रेस वाले उसकी पत्नी सुशीला तिवारी को टिकट देकर चुनाव लड़वाना चाहते हैं।
कांशी राम जी ने बात को समझा और कांशीपुर सीट का सर्वे करवाया। उन्होंने पाया कि वहाँ लगभग 2500 वोटें ब्राह्मणों की हैं, 48000 वोटें चमारों की, 42000 वोटें मुसलमानों की और सिखों की वोटें भी ठीक-ठाक संख्या में थी। कांशी राम जी ने उन प्रतिनिधियों को बुलाकर कहा कि आप अभी जाकर कांग्रेस से टिकट की माँग करो क्योंकि आप आज तक कांग्रेस को ही तो वोट देते आए हो।
उनमें से एक कुम्हार था, एक दाने भूनने वाली जाति से और एक गडरिया जाति से था। साहेब ने उन्हें बताया कि उनकी कांशीपुर सीट से कुम्हारों की वोट 3500 है, झयुरों (दाने भूनने वाले) की 5000 और गड़रियों की वोट 6000 है। यदि आपको कांग्रेस वाले कहेंगे कि आपका वोट तो कुल मिलकर चार-चार, पाँच-पाँच हजार ही है, तो आप जीतोगे कैसे? तो उनसे कह देना कि आप जिस एन. डी. तिवारी ब्राह्मण की पत्नी को उस सीट से टिकट देकर चुनाव लड़वाना चाहते हो, उस सीट पर ब्राह्मणों का वोट तो महज 2500 ही है। जब 3500 वोटों वाला कुम्हार, 5000 वोटों वाला झयुर और 6000 वोटों वाला एक गडरिया चुनाव नहीं जीत सकता तो फिर 2500 वोटों के साथ एन. डी. तिवारी की पत्नी कैसे चुनाव जीत सकती है?
इस बात का पता जब एन. डी. तिवारी की पत्नी को चला तो वह यह कहकर मैदान छोड़ भाग गई कि मुझे तो पता ही अब चला है कि ब्राह्मणों का वोट केवल 2500 है।
यूँ देखा जाए तो इस बात का पता कांग्रेस को भी नहीं था। कांग्रेस के लीडर भी परेशान होते हुए तीनों प्रतिनिधियों से कहने लगे कि यह बात आपको कांशी राम ने बताई होगी! ऐसे आँकड़े वही ला सकता है!
उधर कांशी राम जी की इस बात की चर्चा मीडिया में भी होने लगी कि कांशीपुर के उपचुनाव को लेकर कांशी राम ने गड़बड़ी करनी शुरू कर दी है। उधर तिवारी की पत्नी के चुनाव लड़ने से इनकार करने पर कांग्रेस सकते में आ गई कि अब क्या किया जाए?
दरअसल, कांशी राम जी के इन आँकड़ों की चर्चा आम हो गई थी और कोई भी कांग्रेस की टिकट से चुनाव लड़ने को तैयार नहीं हुआ। आखिर कांग्रेस ने वहाँ से किसी ब्राह्मण को न
खड़ा करते हुए रिजवी अहमद नाम के एक मुस्लमान को खड़ा करने का फैसला किया। लेकिन रिजवी के खिलाफ कांग्रेस का एक बाग़ी, जिसका नाम अकबर अहमद डिम्पी (जो कि संजय गांधी के खेमे का था) था, वह आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर खड़ा हो गया। कांशी राम जी डिम्पी से मिले और कहा कि तुम डट कर चुनाव लड़ो, हम तुम्हें हर संभव सपोर्ट करेंगे। हमारे पास 42000 वोट मुसलमानों का है और 48000 वोट चमारों का है।
आखिर चुनाव हुए। कांग्रेस की, उत्तर प्रदेश और केन्द्र, दोनों जगह सरकार होने के बावजूद उनका उम्मीदवार अहमद रिजवी 35 हजार 62 वोट ही हासिल कर पाया। बसपा का उम्मीदवार उसके मुकाबले में तीसरे नंबर पर रहा। इसके बाद ही पूरे उत्तर प्रदेश की सियासत में छाया ब्राह्मणवाद का वर्चस्व मंद पड़ना शुरू हुआ। अकबर अहमद डिम्पी 43 हजार 215 वोट हासिल कर उपचुनाव जीत गया।
छोटे संगठनों से बड़े काम नहीं किए जा सकते। इसलिए बड़े कामों को अंजाम देने के लिए बड़े संगठन बनाने पड़ेंगे- साहेब कांशी राम।
प्रस्तुत करते है।
इंजीनियर तेजपाल सिंह
94177-94756
जुॅग पलटाऊ बहुजन महानायक
पुस्तक मैं कांशीराम बोलता हूं-भाग 1
पम्मी लालो मजारा-95011-43755

