Thursday, February 26, 2026
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जब जमीर गुलामी का आदि हो जाए, तब ताकत नहीं रखती कोई मायने

मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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महात्मा फुले और बाबा साहेब डॉ अंबेडकर मानसिक गुलामी को सबसे बड़ी गुलामी मानते थे। भारत में मानसिक गुलाम बनाने में धर्म का बहुत बड़ा योगदान रहा है। हजारों वर्षों से धर्म के नाम पर छुआछूत, अंधविश्वास फैला कर लोगों को आपस में ही बाँट दिया गया । यह विभेद देश की तरक्की में सबसे बड़ा बाधक है। जब लोगों का ज़मीर गुलामी का आदी हो जाए, तब ताकत कोई मायने नहीं रखती । डॉ भीमराव अंबेडकर ने स्वतंत्र भारत की नीव स्वतंत्रता, न्याय और सम्मानता की आधारशिला पर रखी। डॉ अंबेडकर ने धर्म के नाम पर जाति उत्पीड़न की जिस पीड़ा को झेला, वह किसी दूसरे के साथ होने नहीं देना चाहते थे। उन्होंने हमेशा सामाजिक और मानसिक गुलामी को राजनीतिक गुलामी से बड़ा माना। बाबा साहब कहते थे- राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाये।
भारत स्वतंत्रता के बाद 1947 से लेकर आज तक एक स्वतंत्र राष्ट्र है, और इसका आत्मनिर्भरता और सुशासन में प्रगट होने का प्रयास किया गया है। हालांकि, समाज में विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक चुनौतियां हैं जो कई लोग आज भी गुलामी या विभिन्न प्रकार की असमानता का सामना कर रहे हैं जिसमें आर्थिक असमानता, सामाजिक असमानता, राजनीतिक और आर्थिक दुर्बलता शामिल हैं। इसके साथ ही बेरोजगार युवा वर्ग रोजगार के लिए भटक रहा है और महंगाई का पारा तो वैसे ही गरम है। एक तरफ अनाज सड़ रहा है तो दूसरी तरफ लोग भूखे पेट भी सो रहे हैं। गर्म कपड़ों की भरमार के बावजूद लोग ठंड से जान गंवा रहे हैं और इन विकट परिस्थितियों में आज गरीब, बेसहारा और बेरोज़गार युवा सामाजिक गुलामी का शिकार हो रहा है। बाकी: “कुछ तो चाहत रही होगी इन बारिश की बूंदों की भी, वरना कौन गिरता है इस जमीन पर आसमान तक पहुंचने के बाद….”
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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