Thursday, February 26, 2026
Homeनागपूरआशुलिपिक : कारिगीरी की करामात !

आशुलिपिक : कारिगीरी की करामात !

प्रविण बागडे नागपूर
भ्रमणध्वनी : 9923620919
ई-मेल : pravinbagde@gmail.com


         आशुलिपि लिखने की एक विधि है, जिसमें सामान्य लेखन की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से लिखा जाता है, जिसमें छोटे प्रतीकों का उपयोग किया जाता है। आशुलिपि में लिखने की क्रिया आशुलेखन कहलाती है। स्टेनोग्राफी से आशय है तेज और संक्षिप्त लेखन। जिसे हिन्दी में ‘शीघ्रलेखन’ या ‘त्वरालेखन’ भी कहते हैं। लिखने और बोलने की गति में अंतर है। साधारण तौर पर जिस गति से कुशल से कुशल व्यक्ति हाथ से लिखता है, उससे चारगुनी, पाँचगुनी गति से वह संभाषण करता है। ऐसी स्थिति में वक्ता के भाषण अथवा संभाषण को लिपिबद्ध करने में विशेष रूप से कठिनाई उपस्थित हो जाती है। इसी कठिनाई को हल करने के लिये हिंदी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं में त्वरालेखन का आविष्कार बहुत बाद में हुआ। वास्तव में विदेशी शासन के अधीन होने के कारण हमारे देश की न तो कोई राजभाषा थी और न कोई प्रांतीय भाषा भी अपने प्रांत में सरकारी कामकाज में विशेष महत्त्व प्राप्त कर सकी थी। इसलिये हिंदी टंकण की तरह, हिंदी त्वरालेखन की मूल प्रेरणा अंग्रेजी शार्टहैंड से ही प्राप्त हुई।

      आशुलिपि की बहुत सी पद्धतियाँ हैं। आशुलिपि के सभी तरीकों में प्रायः प्रयुक्त होनेवाले कुछ शब्दों एवं वाक्यांशों के लिए संकेत निश्चित होते हैं। जिसमें सुशिक्षित व्यक्ति इन संक्षेपों का उपयोग करके उसी गति से लिख सकता है, जिस गति से कोई बोल सकता है। संक्षेप विधी वर्णों पर आधारित होती है। आजकल बहुत से सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों में भी आटोकम्प्लीट आदि की व्यवस्था है, जो आशुलिपि का काम करती है। आशुलिपि का प्रयोग उस काल में बहुत होता था जब रिकार्डिंग मशीनें या डिक्टेशन मशीने बनीं नहीं थीं। व्यक्तिगत स्क्रेटरी तथा पत्रकारों आदि के लिए आशुलिपि का ज्ञान और प्रशिक्षण अनिवार्य माना जाता था। स्टेनोग्राफ़ी में युवाओ के लिये अच्छा कॅरियर है, यह 10 वी कक्षा के बाद किया जा सकता। इसे लिखने की कई प्रणाली प्रचलन में है। अंग्रेजी में पीटमैन मुख्यतः प्रचलित है तथा हिन्दी में ऋषि प्रणाली, विशिष्ट प्रणाली, सिह प्रणाली आदि है। वैसे हर लेखक की अपनी एक विशेष प्रणाली बन जाती है।

      हर साल स्टेनोग्राफरो की भर्ती से संबंधित विज्ञापन पर्याप्त मात्रा में निकलते हैं। स्टेनोग्राफर के पद का वेतनमान भी आकर्षक होता है। स्टेनोग्राफर पर कार्यालय या संस्था के गोपनीय दस्तावेजों को संभालने का दायित्व रहता है। स्टेनोग्राफर अपने अधिकारी के प्रति विश्वनीय पद है। इस पद पर काम करना एक गरिमापूर्ण व चुनौतीपूर्ण है। भारत में स्टेनोग्राफर के पद हर राज्यों के अदालतों, शासकीय कार्यालयों, मंत्रालयों, रेल्वे विभागों में होते हैं। स्टेनोग्राफर का कोर्स करने के लिए कड़े परिश्रम की आवश्कता होती है, क्योंकि इस भाषा में शब्द गति होना आवश्यक है। एक कुशल स्टेनोग्राफर बनने के लिए उस विषय की भाषा का व्याकरण का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। स्टेनोग्राफर (आशुलिपिक) बनने के लिए 100 शब्द प्रति मिनट की गति उत्तीर्ण करना आवश्यक होता है। देश में विभिन्न संस्‍थानो में स्टेनोग्राफर के कोर्स करवाए जाते हैं। देश में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आई.टी.आई) में भी स्टेनोग्राफर का एक वर्षीय कोर्स करवाया जाता है।

     इन संस्थानों में 100 शब्द प्रति मिनट की गति से परीक्षाएं भी ली जाती हैं। इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद स्टेनोग्राफर बन सकते हैं। सरकारी विभागों द्वारा विज्ञापनों में स्टेनोग्राफर की भर्तियां निकाली जाती हैं। शार्टहैन्ड (आशुलिपि) का कोर्स शासकीय संस्थाओ में जैसे पॉलिटेक्निक कालेजो में एम.ओ.एम (आधुनिक कार्यालय प्रबंधन या मॉडर्न ऑफिस मैनेजमेंट) के रूप में उपलब्ध है। इसमे आशुलिपि के अलावा कम्प्यूटर, टंकण एवं लेखा से संबंधित कोर्स करवाये जाते हैं। इसके अलावा भारतीय तकनीकी संस्थानो में भी यह कोर्स करवाया जाता है। जिसकी अवधि 1 वर्ष की होती है। इसमें आशुलिपि के अलावा अन्य सहायक विषय एवं टंकण कोर्स भी महत्वपूर्ण होते हैं। इन संस्थाओ में 100 एवं 80 शब्द प्रति मिनट की गति से परीक्षाएँ ली जाती है।

      संसार की भाषाओं में त्वरालेखन का प्रयास प्राय: रोम साम्राज्य में ईसा पूर्व 63 में हुआ। रोम के सीनेट में सिसरो आदि के भाषणों को नोट करने के लिये मार्कस टुलियस टिरो ने त्वरालेखन की एक प्रणाली का आविष्कार किया, जिसे ‘टिरोनियन नोट’ कहा जाता था। इस प्रणाली का प्रचलन रोम साम्राज्य के पतन के पश्चात कई शताब्दियों बाद तक रहा। इसके साथ ही ईसा की चौथी शताब्दी में ग्रीस में त्वरालेखन का आविष्कार हुआ जिसका प्रचलन आठवीं शताब्दी तक रहा। वर्तमान त्वरालेखन का जन्मस्थान इंग्लैंड है। रानी एलीजाबेथ के समय में ‘ब्राइट्स सिस्टम’ नामक शार्टहैंड का आविष्कार हुआ। फिर 1630 में टामस शेल्टन ने त्वरालेखन पर एक पुस्तक प्रकाशित कराई। इसके पश्चात 1737 में डॉ. जॉन बायरन ने त्वरालेखन की ‘यूनिवर्सल इंगलिश शार्ट हैंड’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित कराई। किंतु इन सभी पद्धतियों में लघुप्राण अक्षरों को हटाकर तथा कुछ अन्य अक्षरों को शब्दों के बीच में से निकालकर संक्षिप्त किया जाता था, इससे वक्ता के भाषण को नोट करने में सहूलियत हो जाती थी। लेकिन इसके साथ ही ध्वनि के आधार पर लिखने का भी प्रयास होता रहा।

      सर आइज़ैक पिटमैन को आधुनिक आशुलिपि का जनक माना जाता है। उनके जन्मदिन पर ‘स्टेनोग्राफर दिवस’ मनाया जाता है। स्टेनोग्राफी जिसे अंग्रेजी में शॉर्टहैंड के नाम से जाना जाता है, एक स्टेनोग्राफर का काम है। घ्वनी पध्दती सर आयझॅक पिटमन की पुस्तक ‘स्टेनोग्राफिक साउंड हैंड’ 1837 में प्रकाशित हुई। इस पद्धति में स्वर और व्यंजनों को अलग अलग चिह्नों से निर्धारित किया गया। साथ ही संक्षिप्त करने का भी एक नियम बनाया गया। इस पद्धति का विकास होता गया और आगे चलकर यह प्रणाली बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुई। अंग्रेजी में पिटमैन्स प्रणाली का ही विशेष प्रचलन है। वैसे ही हिंदी त्वरालेखन आर्थिक दृष्टि से लाभजनक न होने तथा ब्रिटिश भारत में हिंदी का महत्वपूर्ण स्थान, सरकारी कार्यालयों में न होने के कारण त्वरालेखन के अन्वेषण के विषय में प्रयास अपेक्षाकृत काफी विलंब से हुआ। किंतु फिर भी त्वरालेखन के आविष्कार के लिये यदाकदा प्रयत्न होते रहे। स्वाधीनता प्राप्ति के लिये किए जानेवाले आंदोलनों के समय हिंदी में हुए नेताओं के भाषणों को ब्रिटिश भारत की सरकार नोट कराती थी, जिससे वह सरकार के विरुद्ध प्रकट किए गये आपत्तिजनक विचारों के लिए नेताओं को उत्तरदायी ठहरा सके। उस समय अंग्रेजी के पिटमैन शार्टहैंड के ही आधार पर, अभ्यास के बल पर, भाषणों के नोट लिए जाते थे, किंतु साथ ही हिंदी के त्वरालेखन की नींव पड़ गई थी। इसके पहले हिंदुस्तानी भाषा को नोट करने के लिये उर्दू त्वरालेखन की जो पद्धति प्रचलित हुई थी उसमें कठिन परिश्रम के पश्चात साल डेढ़ साल में एक सौ शब्द प्रति मिनट की गति से लिखा जा सकता था।

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments