मूकनायक /देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
हमारे देश भारत में हर समय कहीं ना कहीं चुनावों की प्रक्रिया चलती रहती है।
कभी पंचायत के चुनाव कभी नगर निकाय के चुनाव कभी विधायिका के चुनाव और फिर लोकसभा के चुनाव और फिर यदाकदा उप चुनाव।
कहने का तातपर्य है कि साल भर नहीं ना नहीं चुनाव चलता ही रहता है।
अब जब चुनाव चलते ही रहते हैं तो फिर हर समय चुनावों में चमचों की जरूरत तो हमेशा ही बनी रहती है।
यही तो वो चमचे है जिनका अपना कोई जमीर नहीं होता ये बहुत ही सफलता पूर्वक अपने स्वामी के तलवे चाटते हुए अपने समाज को धोखा देते हैं और बहुजन राजनीति को सफल होने से रोकते हैं।
😡😡 ये चमचे ही बहुजन राजनीति में सबसे बड़े बाधक हैं।
📘 चलो, अब बात करते हैं सहाब कांशीराम जी की चमचा युग नामक पुस्तक की-
कांशीराम ने इस युग को ‘चमचा युग’ नाम दे इस पर एक पुस्तक लिखी, जो पूरे देश के बहुजन समाज द्वारा काफी मात्रा में खरीदी गई। जिसका नाम ‘The Chamacha Age’, हिंदी में ‘चमचा युग’ है।
कांशीराम के द्वारा लिखित पुस्तक ‘चमचा युग’ के अनुसार- “बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के दुःखद परिणाम के बाद चमचा बनाने की प्रक्रिया इतनी तेजी से शुरू हुई कि आज ये औजार, दलाल न केवल राजनीतिक क्षेत्र में बहुतायत छाए हुए हैं, बल्कि मानव जीवन की प्रत्येक गतिविधियों और संबंधों के क्षेत्र में व्याप्त हैं। शुरू-शुरू में ये ‘औजार’, ‘दलाल’ और ‘पिछलग्गू’ डॉ. आंबेडकर को तथा विवेकवान नजरों को ही दिखाई पड़ते थे और उनके पश्चात इनका पता बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा लगाया जा सकता था, किंतु आज ये ‘औजार’, ‘दलाल’ और ‘पिछलग्गू’ लोग हमारे रोजमर्रा की जिंदगी में इतने सामान्य उपादान बनाये गए हैं कि उन्हें किसी भी आदमी द्वारा जनता के बीच पहचाना जा सकता है। आम आदमी की अपनी एक शब्दावली होती है उसकी शब्दावली में किसी ‘औजार’, ‘दलाल’ या ‘पिछलग्गू’ को ही चमचा कहा जाता है।”
🥄 चमचा अपने आप सक्रिय नहीं हो पाता है, बल्कि उसे सक्रिय करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है। वह चमचों को हमेशा अपने व्यक्तिगत उपयोग और हित में अथवा अपनी जाति की भलाई के लिए इस्तेमाल करता है। जो स्वयं चमचे की जाति के लिए हमेशा नुकसानदेह होता है।
साहब कांशीराम ने चमचा और मिशनरी में फर्क बताया-
👨🦰👩🦰 एक मिशनरी व्यक्ति जहां सबसे अधिक आज्ञाकारी होता है,
🥄 वहीं एक चमचा सर्वाधिक जी-हुजूरी करने वाला एक चापलूस होता है।
🥄 चमचे को उसके अपने ही समुदाय के विरुद्ध प्रयोग किया जाता है,
👩🦰👨🦰 जबकि मिशनरी अपने समुदाय की भलाई के लिए काम करता है।
👨🦰👩🦰 मिशनरी अपने समुदाय के सच्चे और वास्तविक नेता के हाथों को मजबूत करने व उसकी सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध होता है।
🥄🥄 चमचों की आवश्यकता-
किसी ‘औजार’, ‘दलाल’, ‘पिछलग्गू’ अथवा ‘चमचा’ की मांग तभी होती है जब सामने सच्चा और वास्तविक संघर्षकर्ता मौजूद हो।
💎 साहब कांशीराम के अनुसार चमचों के प्रकार-
- जाति और समुदाय के चमचे (अनु. जाति, अनु. जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के चमचे)
- पार्टीवार चमचे।
- अबोध या अज्ञानी चमचे।
- ज्ञानी या आंबेडकरवादी चमचे।
- चमचों के चमचे।
- विदेशों में रहने वाले चमचे।
(🥄🥄चमचा सोने का ही क्यूँ ना हो, मांजा तो राख से ही जाता है।)
संदर्भ पुस्तक-
बहुजन नायक कांशीराम- जीवन और मिशन / 117 – 118
🙏🙏🙏🙏🙏🅰️🅿️
:- ए पी सिंह निरिस्सरो
जय भीम जय कांशीराम
जय भारत जय संविधान

