मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन ऋण/ कर्ज ही है। ऋण लेना जितना आसान है, उसे चुकाना उतना ही मुश्किल है । कभी कभी हम पैसे के अभाव में ऋण से मुक्त हो ही नहीं पाते जिसके फलस्वरूप व्यक्ति की आय का बड़ा हिस्सा ऋण को उतारने में ही चला जाता है और ऐसी स्थिति में लोग तनाव व भयपूर्ण जीवन जीने में मजबूर हो जाते हैं । कई बार हम अपनी अनावश्यक व असीमित इच्छाओं की पूर्ति के लिए ऋण लेने का सहारा ले लेते हैं और यही आदत सुखमय जीवन के लिए घोर घातक सिद्ध होती है ।
बड़े बुजुर्गो का कहना है कि इंसान का व्यवहार देखना हो तो सम्मान दो, आदत देखनी हो तो उसे स्वतंत्र कर दो और इंसान की नीयत देखनी हो तो उसे कर्ज/ऋण दे दो क्योंकि जिंदगी की खासियत है कि इसमें वो कर्ज भी चुकाने पड़ते हैं जो कभी लिए ही नहीं है । कर्ज भी बड़ा अजीब होता है, अमीर पर चढ़ जाए तो वह देश छोड़ देता है और गरीब पर चढ़ जाए तो वह शरीर भी छोड़ देता है । अतः सुखी और शांतिप्रिय जीवन निर्वाह के लिए अनावश्यक कर्ज से बचना ही हितकारी है
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

