Thursday, February 26, 2026
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आखिर कहां है सोने की लंका

मूकनायक /देश

राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा

श्रीलंका वासियों का कहना है कि उनके देश में रावण नाम का कभी कोई राजा नहीं हुआ है | जब रावण ही उनके देश में पैदा नहीं हुआ तो फिर – राम-रावण युद्ध कब कहाँ और कैसे हुआ | उनका कहना है कि राम रावण के युद्ध की कहानियां भी उन्हें भारत से ही सुनने को मिली हैं |
उनके देश में इन कहानियों का कोई ऐतिहासिक या पुरातात्विक सबूत भी अब तक नहीं खोजा जा सका है | मतलब कोई सबूत ही नहीं है | उनका ये भी कहना है कि उनके देश का नाम लंका कभी था ही नहीं |
अब हम भारत वासी नये सिरे से सोचने और इतिहास खोजने पर विचार करें |
मोर्य काल यानी सम्राट अशोक के शासनकाल में इस द्वीप को तामपन्नी कहा जाता था | उस समय के नाविकों ने बड़ी बड़ी नावों के साथ समुद में और कुछ ने द्वीप के समुद्री किनारों पर द्वीप की धरती पर पूरा चक्कर लगा लगा कर अनुमान लगाया था कि उनके द्वीप का आकार पान का पत्ता यानी ‘ताम पन्ना’ के समान है | इसीलिये इस द्वीप का नाम तामपन्नी रखा गया होगा |
इस द्वीप के लोग बहुत बहादुर लड़ाके, मजबूत कद काठी के थे | दूसरे यह कि ये लोग बौद्ध धम्म अनुयायी बन गये थे | चूँकि सिद्धार्थ गौतम बुद्ध को शाक्य सिंह भी कहा जाता था | ये अपने को शाक्य सिंह शेर या सिंह के समान समझते थे | शायद इसीलिये इनके देश का नाम सिंघ दीप या सिंहल दीप के नाम से भी प्रसिद्ध है | आज भी बुजुर्गों की पुरानी किस्सा कहानियों में कहीं न कहीं सिंघल दीप की चर्चा आ ही जाती है |
ऐतिहासिक प्रूफ है कि तात्कालिक जम्बू दीप कहे जाने वाले भारत के महान मगध सम्राट अशोक मौर्य ने बौद्ध धम्म प्रचार प्रसार के लिये अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को अनेक बौद्ध भिक्षुओं व सैनिक सुरक्षा के साथ तामपन्नी या सिंघलदीप भेजा था | ये लोग यहाँ से बोधि वृक्ष की एक शाखा पौधा बनाकर ले गये थे | जिसे सिंघलियों ने आज भी अपने देश में सुरक्षित कर रखा है |
मार्गशीर्ष पूर्णिमा. Full Moon Day. 246 ई.पू. संघमित्रा दिवस है | आज के दिन भिक्खुणी संघमित्ता धम्म प्रचार के लिए बोधिवृक्ष की शाखा लेकर सिरीलंका पहुंची थी. वहां यह दिन बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है |
250 ई.पू. मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति (कॉन्फ्रेंस) हुई जिसमें सम्राट अशोक ने जंबूद्वीप (भारत) से बाहर नौ दिशाओं में धम्म प्रचार के लिए धम्मदूत बौद्ध भिक्षु भेजे | ताम्रपर्णी द्विप (सिंहल देश/ सिरी लंका) में अपनी इच्छा के अनुसार अशोक के पुत्र भिक्षु महेंद्र सम्राट अशोक की आज्ञा लेकर गए थे | संघमित्रा का पुत्र भी साथ गया था |
महेंद्र का सिंहल देश जाना ऐतिहासिक घटना थी | वह अनुराधापुर पहुंचे तो वहां के राजा देवनामप्रिय तिस्स ने अद्भुत स्वागत किया. हजारों लोग धम्म की शरण आकर भिक्षु के रूप में प्रचार करने लगे |
लेकिन वहां कोई भिक्षुणी नहीं थी | राजकुमारी अनुला ने इच्छा जाहिर की कि वहां भिक्षुणी संघ भी हो | सम्राट अशोक को पत्र लिखा कि कोई भिक्खुणी भी भेजे और साथ में बोधिवृक्ष की टहनी भी |
सम्राट अशोक ने पाटलिपुत्र में जब यह बताया तो भिक्खुणी संघमित्रा इसके लिए उत्सुकता से तैयार हो गई | हजारों किलोमीटर दूर खतरनाक समुद्री यात्रा को पार कर ऐसे अनजान द्वीप तक जाना एक भिक्षुणी के लिए बहुत मुश्किल था लेकिन संघमित्रा धम्म के प्रति पूरी तरह समर्पित थी |
बत्तीस वर्ष की युवा भिक्षुणी अर्हत संघमित्ता धम्म प्रचार के लिए पाटलिपुत्र से ताम्रपर्णी द्वीप (सिरी लंका) के लिए रवाना हुई | उनके साथ राज परिवार के कुछ पुरुष सदस्य व भिक्खुणियों का समूह था | लेकिन साथ थी सबसे अनमोल, बौद्धगया के बोधि वृक्ष की एक शाखा |
सम्राट अशोक ने सोने के बड़े पात्र में शाखा को लगाया | स्वयं सम्राट ने भारी जनसमूह के बीच श्रद्धा के साथ पूजा वंदन कर पात्र को सिर पर लिया और गंगा के पानी में गले तक उतर कर नाव में पुत्री को सौंपा | रास्ते में नाग राजाओं ने जगह जगह शाखा की पूजा वंदना की |
बंगाल की खाड़ी से होते हुए दुर्गम समुद्री मार्ग को पार कर सातवें दिन संघमित्रा अनुराधापुर पहुंची | राजपरिवार के साथ भारी धाम्मिक जनसमूह उनके स्वागत में पलक पावडे़ बिछाए खड़ा था | वहां के महामेघवन में बोधिवृक्ष की शाखा को वंदन कर लगाया गया जो आज भी विशाल वृक्ष के रुप में मौजूद है | संघमित्रा के सम्मान में सिरीलंका वासियों ने एक सुन्दर रमणीक उद्यान व विहार बनवाया जिसका नामकरण सम्राट अशोक के नाम पर अशोक वाटिका किया गया |
संघमित्रा के आगमन के दिन राजकुमारी अनुला सहित पांच सौ कन्याओं और सात सौ स्त्रियों ने प्रवृज्या (दीक्षा) ली और भिक्षुणी संघ की स्थापना हुई | इसी के बाद अन्य देशों में भी भिक्षुणी संघ की स्थापना हुई |
दोनों भाई बहनों द्वारा धम्म प्रचार से लंका का सामाजिक, सांस्कृतिक व धाम्मिक परिदृश्य ही बदल गया | बुद्ध व धम्म के प्रति पूरा देश एकाकार हो गया | इनसे पहले वहां बुद्ध का कोई नामलेवा भी नहीं था |
आज सिरीलंका में महेंद्र व संघमित्रा को उतना ही सम्मान दिया जाता है जितना भगवान बुद्ध को | इस प्रकार प्रेम, करुणा व मैत्री की बुद्ध वाणी के धम्म का प्रचार करते हुए महाथेर महेंदा का 80 साल और महाथेरी संघमित्रा का 79 साल की उम्र में परिनिर्वाण हुआ |
उनके सम्मान में विशाल स्तूप बनवाए गये. हर साल माघ शीर्ष पूर्णिमा (full moon day) को ‘संघमित्रा दिवस’ बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है, दुनिया भर से लोग आते हैं |
यह कितना महान है कि ऐसे सम्राट के पुत्र और पुत्री ने सांची के विहार में धम्म साधना की | माता विदिशा देवी ने धम्म प्रचार के लिए प्रेरित किया | ऐसे माता पिता की संतानें सुख सुविधाओं भरा राजसी जीवन त्यागकर भारत से बाहर सात समंदर पार सिरीलंका में आजीवन मानवतावादी धम्म का प्रचार किया | वंदन है उनके महान योगदान को |
भवतु सब्ब मंगलम.. सभी का मंगल होवे, सभी प्राणी सुखी हों |
अनुवादकों की सहायता से मगध की पाली व तामपन्नी की सिंघली भाषा का आदान प्रदान हुआ | तथागत बुद्ध के उपदेशों की खूब चर्चा हुई |
इसी चर्चा से प्रेरणा लेकर सिंघलियों ने तथागत बुद्ध के उपदेशों को मानकर धम्म मार्ग अपना लिया और वो बौद्ध हो गये |
बुद्ध वंदना त्रिशरण पंचशील अष्टांगिक मार्ग और दस पारमिताओं को सिंघलियों ने अपना लिया | यहाँ तक कि उन लोगों ने महेन्द्र, संघमित्रा और उनके साथ गये कुछ भिक्षुओं को भी अपने देश में ससम्मान रोक लिया | फिर महेन्द्र व संघमित्रा आजीवन सिंघलदीप यानी तामपन्नी देश में ही रहे | सिंघल दीप के अनेक पुरुषों तथा भद्र महिलाओं के नाम आज भी महेन्द्र या सिंघे, सिंघा अथवा संघमित्रा जैसे सुनने को मिलते हैं |
सिंघल दीप वासियों ने तथागत बुद्ध के पंचशील सिद्धांत यानी पाँच शीलों को पूरी तरह अपना लिया था | तो इनके देश को पंचशील देश कहा जाने लगा |
फिर शील देश या शीलों का दीप कहा गया |
अंग्रेज लोग इसे सीलोन कहते थे | सीलोन , ये नाम 1960- 1970 के दसक तक प्रचलित था | 1972 में सीलोन वासियों ने अपने देश का नाम सुधार कर सिरीलंका (श्रीलंका) कर दिया जो आज विश्व के मानचित्र पर है |
अब सवाल आता है कि राम-रावण युद्ध वाली लंका कहाँ पर है | रामायण लेखन के कार्यकाल में दूरबीन या सैटेलाइट तो थे नहीं | यदि रामायण के लेखन में कोई सच्चाई छिपी है तो शायद भारत के ही किसी अजनवी या दुर्गम क्षेत्र अथवा किसी बड़े राज्य की राजधानी को ही लंका कहा गया हो | एक बार फिर से ऐतिहासिक व पुरातात्विक खोज की जरूरत है |
यहाँ समझने वाली बात यह भी है कि आजकल जब रामचरितमानस पाठ करने वाले वाचक से शिक्षित तर्कशील युवा प्रश्न करते हैं कि सोना आग से सिर्फ पिघलता है जलकर राख नहीं होता है | इसका मतलब है कि कहीं न कहीं सोने का पिघला हुआ ढेर तो होना ही चाहिये | तब ये रामायण वाचक बेशर्मी से मूर्ख बनाने लगते हैं कि वह लंका रावण के सोने के लिये यानी आराम करने के लिये (Sleeping Room) थी |
फिर जब शिक्षित युवा रामचरितमानस का प्रमाण दिखाते हैं –
बालकांड 177. 178
गिरि त्रिकूट इक सिन्धु मझारी
विधि निर्मित दुर्गम अति भारी |
सोई मय दानव बहुरि सँवारा

कनक रचित मणि भवन अपारा ||

खाई सिन्धु गंभीर अति
चारिहुँ दिशि फिरि आव |
कनक कोट मन खचित दृढ़
वरनि न जाई बनाव ||
यहाँ पर दोनों ही जगह सोना के लिये कनक शब्द का ही प्रयोग किया गया है | कनक शब्द का प्रयोग स्वर्ण (सोना) धातु के लिये किया जाता है | आराम करने वाले सोने (Sleeping Room) के लिये नहीं |
तब यह पाखंडी वाचक इधर उधर ताकने लगते हैं |
चूँकि पूरी लंका सोने की बतायी गयी है तो यह भी सही है कि भयंकर आग में भी सोना सिर्फ पिघलता है जलकर राख कभी नहीं होता है | जरूर कहीं पिघला हुआ सोना आज एक बहुत बड़े सोने के ढेर या पहाड़ी के रूप में दबा हो सकता है | हम तो सोचते हैं कि काश रामचरितमानस की प्रत्येक बात सही हो और वास्तविक सोने की लंका का पता चल जाये | यदि खोज करने पर लंका का पता चल जाता है तो शायद हजारों या लाखों टन सोने की प्राप्ति हमारे देश को हो सकती है |
काश ऐसा हो जाये |
भवतु सब्ब मंगलम

लेखक
डी डी दिनकर मैनेजर
अध्यक्ष बीएसआई
फफूंद जिला औरैया यूपी 206247
9415771347
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