मूकनायक /देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
जब हम इन समादेशों का सही क्रम बताते हैं तो लोगों का यही सवाल होता है कि जब संगठित नहीं होगें तो संघर्ष कैसे करेगें ? मैं समझता हूँ यही सवाल उलट फेर का कारण है। अतः इसका समाधान होना जरूरी है। सवाल यहाँ यह उठता है कि संगठित कैसे होगें ? संगठन बनाने से ? नहीं, कदापि नहीं। यदि ऐसा होता तो दलितों के दस हजार संगठन असंगठित नहीं होते। यदि एक दो संगठित हो भी जाते हैं तो प्रोन्नति स्थानान्तरण या कुछ नियुक्तियाँ करा लेने को ही अपना उद्देश्य समझ बैठते हैं।
अनुसूचित जाति के इन कर्मचारियों ने अपने पीड़ित शोषित भाइयों के लिए यदि समय हुनर व पैसा नहीं दिया तो उनके पढ़े लिखे होने यूनियन बनाने व संगठित होने की कोई सार्थकता नहीं है।
सफल संगठन, सफल संघर्ष से आता है। इसके लिए पीड़ित मानवता के प्रति भावना, समर्पण व अनवरत कार्य अनिवार्य हैं। संगठन संघर्ष करने से बनता है संगठन से संघर्ष नहीं होता।
संगठन संघर्ष का बाईप्रोडक्ट (पैदावार) है। ऐजीटेटिड माइन्ड(आन्दोलित विचारों) से ही संगठन के लिए मार्ग प्रसस्त होता है। संगठन व नेता की तो बात ही करना निरर्थक है। संगठन व नेता संघर्ष से ही निकलते हैं। उनका कोई नोमिनेशन चुनाव पंजीकरण नहीं होता।
पाँच प्रतिशत गुमनाम दलित कर्मचारियों ने राष्ट्रीय स्तर का राजनैतिक दल खड़ा कर दिया और 95 प्रतिशत दलित कर्मचारी मंत्री, महामंत्री, अध्यक्ष बनकर अनु० जाति कल्याण समिति चलाते रहे और आज भी इन्हें सद्बुद्धि नहीं आई। सन् 1956 में बाबा साहेब इनकी करतूतों पर रोये ठीक ही रोये थे। इस प्रकार से बने नेता व संगठन कागज़ी शेर हैं। संघर्ष की डगर बड़ी कठिन व जोखिम पूर्ण है। इसमें मिलता कुछ नहीं सिर्फ देना ही देना है। कबीर के संघर्ष के तेवर देखिये कबिरा खड़ा बाजार में लिए लकुटिया हाथ, जो घर छोड़े आपनो आय हमारे साथ, अब कौन अपना पर जलायेगा। परन्तु यदि जला सके तो उसी की राख से सामाजिक क्रांति के बलिष्ठ अंकुर फूटेंगे।
संदर्भ पुस्तक:
बाबा साहब के तीन उपदेश और उनका सही क्रम
प्रो. डॉ रामनाथ (कानपुर)
🙏🙏🙏🅰️🅿️ निरिस्सरो
जय भीम जय भारत जय संविधान

