Thursday, February 26, 2026
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श्री श्री 108 श्री ?

मूकनायक/ देश

राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा

आज कल हम देखते हैं कि बहुत से साधू महात्मा, पंडा पुजारी, संत महन्त, मठाधीस या किसी धर्म संस्था के अध्यक्ष अथवा धार्मिक पदाधिकारी अपने नाम के आगे श्री श्री 108, 1008 या इससे भी ऊँची संख्या लिखकर, दूसरों के मुँह से अपने लिये संबोधन में सुनकर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं |

अगर इन्हीं लोगों से 108 या 1008 का तात्पर्य पूछा जाये तो ये सब इधर उधर की बातें घुमाफिरा कर बताकर सिर्फ़ गुमराह करते हैं | अथवा संख्या की गिनती के बराबर कुछ विशेष संस्कृत शब्दों के भ्रमजाल या देवी देवताओं के मंत्र जाप की बात करते हैं |

शायद इनमें से अधिकांश को 108 का विवेकशील तार्किक ज्ञान ही नहीं है | अगर सही ज्ञान नहीं है तो पाखंडी शब्द जाल या मंत्र जाप से न तो स्वयं के अन्तर्मन का और न ही जन समुदाय या समाज का कोई कल्याण होने वाला है |
संत कबीर साहेब ने तो माला फेरने वालों और 108 , 1008 मनकों, गुरिया, गोलियों द्वारा शब्द जाल या मंत्र जाप करने वालों को खूब खरी खोटी सुनायी है |

जप माला छापा तिलक
सरै न एकौ काम |
मन काँचे नाचे वृथा
साँचे राँचे राम ||
माला फेरत जुग गया
गया न मन का फेर |
कर की माला फेंक दे
मन की माला फेर ||

पाली भाषा साहित्य – त्रिपिटक व अभिधम्मकोष के महान पंडित ज्ञाता व अनुवादक राहुल सांकृत्यायन व आचार्य नरेन्द्र देव के अनुसार – तथागत भगवान बुद्ध के महा परिनिर्वाण के तीन माह बाद महाराज अजातशत्रु के संरक्षण में मगध में राजगृह के समीप तथागत के भिक्खु संघ व लगभग 3000 अनुयायियों ने अन्य उपासकों के सानिध्य में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया जो लगभग आठ माह तक चली |

इस संगीति में तथागत के 84000 धम्म सूत्रों, उपदेशों को सुनाकर, गाकर या लय बद्ध तरीके से गायन करके या वार्ता करके संगीति सभा में प्रस्तुत किया गया और लिपिबद्ध किया गया | हालाँकि इस संकलन का लिपि लेखन तात्कालिक पाली भाषा की धम्म लिपि में हुआ था | जिसे विदेशी मूल के बहुत से विद्वानों ने पहले उच्चारण किया फिर अपने अपने देश की भाषा में अनुवाद कर लिया | आधुनिक काल में उन्हीं विदेशी भाषाओं से अंग्रेजी और फिर हिन्दी भाषा में अनुवाद कर लिये गये हैं | इनमें से हजारों अभिलेख मौर्य व कनिष्क कालीन शिलालेखों से भी प्राप्त हुये हैं |

अब हम मूल विषय श्री श्री 108 पर आते हैं |
तथागत भगवान बुद्ध के अनुसार मानव मन के विकारों में 108 प्रकार की वर्जित तृष्णायें होती हैं | जो कहीं न कहीं हमारी इन्द्रियों से जुड़ी होती हैं | इन पर विजय पाकर इनसे कैसे विरत रहा जाये ? इस पर संगीति संघ में विशेष चर्चा व व्याख्यान बौद्ध विद्वानों द्वारा प्रस्तुत कर लिपिबद्ध किये गये |

इन्द्रिय सम्बन्धी तृष्णायें –
1- रूप तृष्णा – जिसे हम अपनी आँखों से देखकर पाने का प्रयास करते हैं |
2 – गन्ध तृष्णा – जिसे हम घ्राण (गन्ध) से अनुभव करके पाने का प्रयास करते हैं |
3 – शब्द तृष्णा – जिसे हम कानों से सुनते हैं | मनभावन या कामुक बातें सुनने को लालायित रहते हैं |
4 – रस तृष्णा – जिसे जिव्हा के माध्यम से प्राप्त करते हैं | स्वाद के चक्कर में अधिक पाने की लालसा रखते हैं |
5 – स्पर्श तृष्णा – जिसे हम शरीर या त्वचा के माध्यम से स्पर्श करते हैं | स्पर्श सुख को प्राप्त करना चाहते हैं | सभी प्रकार के भोग विलास भी इस तृष्णा के अन्तर्गत आते हैं |
6 – दर्प तृष्णा या मनो तृष्णा – सभी इन्द्रियों का नियंत्रक (कन्ट्रोलर) हमारा मन ही होता है | यदि हमारा मन दूषित होगा तो तमाम प्रकार के विकार राग द्वेष मोह अहंकार वासनाएं हमें घेरे रहेंगी | इसलिए मन को स्वच्छ व निर्मल रखना सबसे ज्यादा जरूरी है |

उपरोक्त इन्द्रिय तृष्णाओं के तीन भाग हैं-
1- काम तृष्णा – वर्तमान, शारीरिक व मानसिक तृष्णा |
2 – भव तृष्णा – सांसारिक, भौतिक या लौकिक तृष्णा |
3 – विभव तृष्णा – परालौकिक या काल्पनिक तृष्णा |

अब इन तृष्णाओं का पुनः विभाजन है |
1- आध्यात्मिक तृष्णा – आन्तरिक रूप से या यूँ कहें कि मन ही मन में |
2 – बाह्य तृष्णा – बाहरी रूप से या प्रकट रूप में |

अन्तिम रूप से ये सभी तृष्णायें फिर से तीन कालों में विभाजित हो जाती हैं |
1- अतीत की तृष्णा – माँ की कुक्षि से लेकर बचपन जवानी के सुखों को पुनः भोगने की तृष्णा जागृत होना |
2 – वर्तमान की तृष्णा – वर्तमान का सारा सुख सिर्फ हमें मिले, हमारी तूती बोले |
3 – भविष्य की तृष्णा – भविष्य के सुख के लिए बहुत सी धन दौलत जोड़ना, इसमें स्वर्ग नर्क के लोभ की तृष्णा भी शामिल है |

अब हम देखते हैं कि कुल कितनी तृष्णायें हैं जिनसे मुक्ति पाने के उपदेश तथागत बुद्ध ने दिये थे और जिन्हें इस संगीति में लिपिबद्ध किया गया था |
इन्द्रिय तृष्णा- 6
काम भव विभव तृष्णा 6×3=18
आन्तरिक व बाह्य तृष्णा 18×2=36
अतीत वर्तमान भविष्य 36×3=108
यही वो 108 तृष्णायें हैं जिनसे हमें मुक्त होने की जरूरत है |
यह मुक्ति ध्यान साधना विपस्यना पंचशील व आर्य अष्टांग मार्ग, प्रज्ञा शील करुणा मैत्री अपनाने से ही संभव है | यह युक्ति स्वयं तथा सम्पूर्ण समाज के लिये हितकारी है | माला फेरने अथवा श्री श्री 108 लिखने या किसी से अपने लिये संबोधन करवाने से संभव नहीं है |

इसी प्रथम बौद्ध संगीति में तथागत के धम्म उपदेश लिपिबद्ध होने से दशरथ जातक, त्रिपिटक (सुत्त पिटक,विनय पिटक,धम्म पिटक) जैसे ग्रन्थों की रचना हुई | बौद्धों का सबसे बड़ा ग्रन्थ अभिधम्मकोष है | जो अब हिन्दी भाषा में भी उपलब्ध है |
नमो बुद्धाय

लेखक
डी डी दिनकर (मैनेजर)
अध्यक्ष बीएसआई
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला औरैया यूपी
9415771347

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