
मूकनायक राजस्थान बूंदी
जिला ब्यूरो चीफ राकेश कुमार बैरवा
आपको हजारों सालों तक गुलाम बनाए रखने की अपने खिलाफ साजिश के काले इतिहास को जानोगे तो तन-बदन में आग लगेगी :—-
“महाड़ तालाब से मनुस्मृति दहन तक का क्रांतिकारी आंदोलन”
🇪🇺19 मार्च,1927 से 25 दिस,1927🇪🇺
“ब्राह्मणवाद के जातिवाद का काला सच”
🔥जानिएं मनुस्मृति जलाने के कारण🔥
जिस दौर में कुत्ता भी तालाब से पानी पी लिया करता था, उस दौर में आरक्षित वर्ग का व्यक्ति तालाब से पानी भी नहीं पी सकता था। उन कठिन परिस्थितियों में एक युवा क्रांतिकारी योद्धा डॉ भीमराव अम्बेडकर साहब ने अछूत, बहिष्कृत, वंचित वर्ग के लिए पानी पीने का संघर्ष किया जिसकी पूर्णाहुति मनुस्मृति को दहन करके हुई….
महाराष्ट्र के कोलाबा जिले के महाड़ गांव में चवदार तालाब था। उस तालाब से अछूतों को पानी पीने का अधिकार नहीं था। सनद रहे, उस तालाब से ईसाई, मुसलमान, पारसी, जानवर सभी पानी पी सकते थे, परंतु स्वघोषित सवर्ण यानि ब्राह्मण उस तालाब से अछूतों को पानी नहीं पीने देते थे।
बंबई काउंसिल में समाज-सुधारक श्रीयुत बोले ने प्रस्ताव रखा था कि सरकारी एवं सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश करने का अधिकार सरकार अछूत वर्ग को भी प्रदान करें। इस प्रस्ताव को 04 अगस्त, 1923 को बंबई काउंसलिंग में पारित कर दिया गया और 11 सितम्बर, 1923 को सभी विभागों को इसे लागू करने के आदेश दिये। 1924 में महाड़ गांव की नगरपालिका ने चवदार तालाब के पानी का प्रयोग करने का अधिकार अछूतों को दे दिया, परंतु यह आदेश वहां के ब्राह्मणों को कतई मंजूर नहीं था….
दलित जाति परिषद ने महाड़ में 19 व 20 मार्च, 1927 को डॉ अम्बेडकर साहब की अध्यक्षता में एक विशाल सभा रखी थी जिसमें महाराष्ट्र व गुजरात के सैकड़ों गांवों से हजारों वंचित-अछूत लोग पहुंचे थे। इस सभा में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि कल सुबह चवदार तालाब पर अछूतों को पानी पीने का अधिकार अमल में लाया जाएगा। दूसरे दिन डॉ भीमराव अंबेडकर साहब के नेतृत्व में हजारों की तादाद में लोग सभा स्थल से तालाब की ओर कूच कर गये। चवदार तालाब पर पहुंचकर बाबा साहब ने सबसे पहले पानी पिया और उनके बाद में अन्य लोगों ने वहां पानी पिया। इस बात की भनक जैसे ही ब्राह्मणों को लगी तो उन्होंने एकत्रित होकर सभा स्थल पर अछूतों पर प्राणघातक कातिलाना हमला कर दिया जिसमें बहुत बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे….
छुआछूत और भेदभाव की कुत्सित मानसिकता के चलते सनातनियों को अछूतों के द्वारा तालाब में पानी पीना नागवार गुजरा और उन्होंने तालाब को शुद्ध करने के लिए एक रस्म अदा की जिसमें 108 घड़े जल तालाब से निकालकर बाहर फेंका गया तथा गाय के गोबर, मूत्र, दूध, दही और घी से भरे हुए कुछ घड़े ब्राह्मण पुरोहितों ने मंत्रोच्चारण की नौटंकी करके तालाब में उडेले तथा तालाब को शुद्ध करने का स्वांग रचा।
इस महाड़ के चवदार तालाब के आंदोलन से अछूतों में संघर्ष करने का जज्बा पैदा हुआ और उन्होंने अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने का प्रण किया।
इसकी परिणीति यह हुई कि महाड़ नगरपालिका ने ब्राह्मणों के दबाव में आकर अपना 1924 का प्रस्ताव जिसके अनुसार तालाब अछूतों के लिए भी खोला गया था, को 04 अगस्त, 1927 को रद्द कर दिया।
इस निरस्तीकरण के आदेश से बाबा साहब अम्बेडकर को बहुत बड़ी चुनौती मिली जिसे डॉ अम्बेडकर साहब ने मजबूत इरादों के साथ स्वीकार किया और एक सत्याग्रह समिति का निर्माण किया जिसके तत्वावधान में सत्याग्रह करने के तारीखें 25 तथा 26 दिसंबर, 1927 तय की गई….
24 दिसंबर, 1927 को बाबा साहब अपने साथ 200 प्रतिनिधियों के साथ महाड़ पहुंचे, जहां पर हजारों की संख्या में अछूतों ने बाबा साहब का स्वागत किया और जुलूस के रूप में बाबा साहब को सत्याग्रह स्थल पर ले गए। उस पंडाल में 15000 से भी ज्यादा लोग बाबा साहब का इंतजार कर रहे थे….
सत्याग्रह की तैयारियां पूरी हो गई थी और सत्याग्रहियों में महाड़ के चवदार तालाब को लेकर जबरदस्त जोश था….
25 दिसम्बर, 1927 को जिला मजिस्ट्रेट ने सत्याग्रह स्थल पर आकर बाबा साहब से मुलाकात की और सूचना दी कि 12 ब्राह्मणों ने अदालत में दावा किया है कि चवदार तालाब उनकी सम्पत्ति है, इसीलिए अदालत का निर्णय आने तक आपको सत्याग्रह स्थगित करने की सलाह दी जाती है….
आखिर भारी अंतरविरोध के बीच में सत्याग्रह स्थगित करने का निर्णय लिया गया, परन्तु बाबा साहब ने कहा कि सत्याग्रह स्थगन का मतलब यह नहीं है कि हमने हमारे अधिकारों के लिए लड़ना बंद कर दिया है। हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक हम चवदार तालाब पर अपना अधिकार स्थापित नहीं कर लेते हैं….
इस सत्याग्रह में यह भी निर्णय लिया गया कि ऊँच-नीच और छुआछूत-भेदभाव की जड़मूल मनुस्मृति है और मनुस्मृति को विषमता, निर्दयता तथा अन्याय का समर्थक ग्रंथ कहा गया….
अंततः 25 दिसम्बर, 1927 की रात्रि को सत्याग्रह के पंडाल में एक खड्डा खोदकर उसमें मनुस्मृति को डालकर समारोहपूर्वक जलाया गया….
इसीलिए महाड़ के सत्याग्रह में ही मनुस्मृति दहन करने का निर्णय भी लिया गया ताकि ब्राह्मणों पर करारी चोट मारी जा सके….
आखिर में बंबई उच्च न्यायालय ने 17 मार्च, 1937 को महाड़ के चवदार तालाब का पानी पीने का निर्णय अछूतों के हक में दिया….
अब जानिएं कि मनुस्मृति को क्यों जलाया गया?
शूद्र तु कारयेद्दास्यं क्रीतमक्रीतमेव वा।
दास्यायैव हि सृष्टो$सौ ब्राह्मणस्य स्वयंभुवा।।
अर्थात
शूद्र से दास का ही काम लें क्योंकि ब्रह्मा ने शूद्र की रचना गुलामी करने के लिए ही की है।
यद्राष्ट्रं शूद्रभूयिष्टं नास्तिकाक्रान्तमद्विजम्।
विनश्यत्यासु तत्कृत्स्नं दुर्भिक्ष व्याधिपीड़ितम्।।
अर्थात
जिस देश में शूद्रों की अधिकता होगी, उस देश का शीघ्र नाश हो जाएगा।
लोकानां तु विवृद्धयर्थ मुखबाहुरुपादत:।
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं निरवर्तंयत्।।
अर्थात स्वयं ब्रह्मा ने मुँह से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और पैरों से शूद्र को उत्पन्न किया।
अर्थात शूद्रों को नीच, तुच्छ, अछूत मानने, जातीवाद करने और अत्याचार करने का सबसे बड़ा कारण यही है।
मंगल्यं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलान्वितम्।
वैश्यस्य धनसंयुक्ते शूद्रस्य तु जुगुप्सितम्।।
अर्थात ब्राह्मण का नाम मंगलवाचक हो, क्षत्रिय का नाम बल-सूचक हो, वैश्य का नाम धन-वाचक हो और शुद्र का नाम घृणा पैदा करने वाला हो।
~अर्थात शूद्रों के नामों से ही नफरत, घृणा, भेदभाव, छुआछूत की बदबू आती रहे और नामों से ही उनकी अछूत की पहचान बनी रहे।~
न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम।
न चास्योपदिशेद्वर्मं न चास्य व्रतमादिशेत्।।
अर्थात शूद्र को बुद्धि न दें, न उसे उच्छिष्ट ही दें और उसे हवि का अंश ही दें। न उसे धर्म का उपदेश करें और न उसे व्रत-पालन का आदेश दें।
अर्थात धर्म और जाति के नाम पर शूद्रों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अशिक्षित रखकर बुद्धिहीन बनाए रखने की योजनाबद्ध साजिश रची गई थी।
उच्छिष्टमन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च।
पुलाकाश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदा:।।
अर्थात शूद्र को झूठन खाने के लिए दी जाएं, पुराने वस्त्र पहनने के लिए दिये जाएं, निस्सार धान्य दिये जाए और फटे-पुराने ओढ़न-बिछावन दिये जाएं।
अर्थात शूद्रों को जन्मजन्मांतर बेचारा, लाचार, निर्धन रखने का खतरनाक मकड़जाल बुना गया था।
एकमेव तु शूद्रस्य प्रभु: कर्म समादिशत्।
एतेषामेव वर्णानां शूश्रषामनसूयया।।
अर्थात ईश्वर ने शूद्र को केवल एक ही कर्म करने का आदेश दिया कि वो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा करें।
अर्थात शूद्रों को दास, नौकर, चाकर, गुलाम बनने के लिए मजबूर किया गया था।
वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिक: स्मृत।
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थी$ग्निपरिक्रिया।।
विस्रब्धं ब्राह्मण: शूद्रादद्रव्योपादानमाचरेत।
नहि यस्यास्ति किञ्चित्स्वं भर्तुहार्यधनोहि स:।।
अर्थात ब्राह्मण को आवश्यकता पड़े तो वो शूद्र का धन बेरोकटोक ले सकता।
अर्थात जाति-धर्म की आड़ में ब्राह्मणों को शूद्रों का धन छीनने का अधिकार।
शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसंचय:।
शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानवबाघते।।
अर्थात शूद्रों के पास धन का संचय नहीं होने देना चाहिए क्योंकि धनसंचय के बाद शूद्र ब्राह्मणों को ही कष्ट पहुँचाता है।
अर्थात शूद्रों को वर्ण के आधार पर येन-केन-प्रकारेण मजबूर ही बनाए रखना है।
राजान्नं तेज आदत्ते, शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्।
आयु सुवर्णकारान्नं, यशश्चमीवकर्तिन।।
अर्थात राजा का अन्न खाने से ब्राह्मण का तेज नष्ट होता है, शूद्र का अन्न खाने से ब्रह्म-तेज नष्ट होता है, सुनार का अन्न खाने से आयु नष्ट होती है और चमार का अन्न खाने से यश नष्ट होता है।
अगर ऐसा है तो शूद्रों के द्वारा ब्राह्मणों को दान, अनुदान, मतदान और सम्मान देना बंद कर देना चाहिए।
अर्थात स्त्रियों का विवाह करना ही उनका यज्ञोपवीत धारण करना है, अर्थात जैसे शूद्रों के लिए यज्ञोपवीत धारण करना निषिद्ध है, उसी प्रकार स्त्रियों के लिए भी निषिद्ध है।
नास्ति स्त्रीणां क्रिया मंत्रैरिति धर्मै व्यवस्थिति:।
निरिन्द्रया ह्यामन्त्राश्च स्त्रियो८नृतमिति स्थिति:।।
अर्थात स्त्रियों का संस्कार मंत्रों में नहीं होता है, यही शास्त्र की मर्यादा है। धर्मशास्त्र में अथवा किसी मंत्र में इनका अधिकार नहीं है, इसीलिए ये झूठ के समान अशुभ हैं।
मनुस्मृति में स्त्रियों को भी शूद्र ही माना गया है और शूद्रों की भांति ही उन्हें भी मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया है। महिलाओं के लिए तो और भी कठोर नियम मनुस्मृति में लिखे गए हैं। उन्हें खतरनाक रूढिवादी परम्पराओं में जकड़ा गया। इसी मनुस्मृति के कारण महिलाओं को हजारों सालों तक अशिक्षित रखा गया और अपवित्र माना गया। कभी पुरूषों के समान समानता नहीं दी गई।
उपर्युक्त कुछ श्लोक व उनके भावार्थ तो मात्र उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किये गए हैं, परन्तु ऐसे सैकड़ों श्लोकों से शूद्रों व महिलाओं को सैकड़ों सालों तक दर्दनाक नारकीय जीवन जीने पर विवश किया गया था।
जातीय अत्याचारों की ऐसी विभत्स घटनाएं आज भी बदस्तूर जारी हैं जिनकी एकमात्र वजह मनुस्मृति है।
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आखिरकार गहन अध्ययन और शोध से यह साबित हो गया कि मनुस्मृति पिछड़ों, शोषितों, वंचितों, महिलाओं के लिए ब्राह्मणवादी साजिश की जहरीली धार्मिक पुस्तक है जिसमें पिछड़ों, शोषितों, वंचितों, महिलाओं के लिए सिर्फ सजाओं का प्रावधान किया गया है जो पिछड़ों, शोषितों, वंचितों, महिलाओं को जन्म से लेकर मृत्यु तक जातीय कैद में रखने का ब्राह्मणवादी भयंकर मकड़जाल है
और…
इसी की परिणिति थी कि क्रांतिकारी महान समाजसुधारक बाबासाहेब की उपस्थिति में 25 दिसम्बर, 1927 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले के महाड़ गांव में चवदार तालाब के पानी के आंदोलन के दौरान *महाड़ गांव में मनुस्मृति का दहन किया था।
बाबासाहेब का समर्थन करते हुए उपस्थित सभी आंदोलनकारियों ने एक स्वर में कहा कि मनुस्मृति अछूतों को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक रूप से गुलाम बनाए रखने के लिए रचा गया एक षड्यंत्र है जो हमारी प्रगति में बाधक है। इस कारण इसे जलाया जाना बहुत जरूरी है। यह ग्रंथ ऊंच-नीच तथा भेदभावपूर्ण विचारों से शूद्रों को पतन की ओर धकेलता है।
मनुस्मृति जलाने के बाद जब डॉ आम्बेडकर साहेब से पूछा गया कि उन्होंने मनुस्मृति क्यों जलाई? तो बाबासाहेब ने कहा कि सदियों से हासिए पर डाल दिये गए अछूत समाज की गरीबी, दरिद्रता, पीड़ा व दुर्दशा पर हिंदुओं का ध्यान खींचने के लिए सिर हथेली पर रखकर हमने यह महान कार्य किया है।
अतः इस ऐतिहासिक दिवस पर ऐसे सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रनायक, महान समाजसुधारक, परमश्रद्धेय बाबासाहेब को हम कोटि-कोटि नमन करते हैं….🙏🙏
परमपूज्य बाबासाहेब थे तो आज एससी, एसटी, ओबीसी के लोग व महिलाएं मनुस्मृति के दंडात्मक अत्याचारों से बचे हुए है

