मूकनायक /देश
*राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा*
भारत के तीज त्योहार और कुछ नहीं शूद्रों की पराजय का दर्द और मनुवादियों की जीत के जश्न हैं |
मनुवादियों ने होली, दीवाली, करवाचौथ, नवदुर्गा, दशहरा, रावणवध, रक्षाबंधन, नागपंचमी, गुरुपूर्णिमा, गोवर्धन पूजा, धनतेरस, छठ पुजा, खिचड़ी, कुम्भ मेला, कथा भागवत, रामलीला, कृष्ण लीला, होम हवन, राहु केतु मंगल शनि, नामकरण, शादी ब्याह की रस्में, मॄतक भोज, श्राद्ध भोज आदि पता नहीं कितने तीज त्योहार आज तक जीवित रखे हैं |
यह बहुजनों पर ये इनके बहुत बड़े षडयंत्र हैं लेकिन आज बहुजनों के लिए बहुत बड़े उपकार साबित हो रहे हैं |
एक समय था जब मनुवादियों ने बहुजन बौद्ध धम्मानुयायी मतावलम्बियों का सम्पूर्ण इतिहास, ज्ञान चिकित्सा, तर्कपूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण से पूर्ण सभी हस्तलिखित पुस्तकें, पुस्तकालय, विद्यालय, बौद्ध विहार सम्पूर्ण भारत से पूरी तरह नष्ट कर दिये या जलाकर खाक कर दिये | बौद्ध भिक्षुओं की ज्ञानवर्धक पुस्तकें तो सोने (स्वर्ण) से भी अधिक कीमती मानी जाती थीं | तभी तो कई देशों के विद्यार्थी ज्ञानार्थी यहाँ की पुस्तकों का अपने देश की भाषा में अनुवाद करके ले जाते रहे हैं |
शायद इसीलिये मनुवादियों ने बौद्धों के विद्यालय पुस्तकालय जलाने को ही सोने की लंका जलाना कहा है |
मनुवादियों ने सबसे पहले हमारे शासक वर्ग को छल कपट धोखा देकर आपस में लड़ाकर कमजोर किया और उन पर अपना अधिकार किया | फिर सत्ता परिवर्तन का ताण्डव किया |
इसी तरह सभी बौद्ध विरासतों का नाश, बोद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम बौद्ध अनुयायियों के घर उजाड़ कर गुलाम शूद्र बना कर हजारों जातियों में बाँट दिया | जिन्होंने दासता नहीं स्वीकारी उनका सामाजिक बहिष्कार, नगरीय सभ्यता से बहिष्कार | इन गुलाम शूद्रों और बहिष्कृत लोगों की शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया |
सभी बहुजन मूलनिवासी बौद्ध धर्म के अनुयायी जिन्हें अछूत घोषित करके आर्थिक सामाजिक धार्मिक शैक्षिक व राजनैतिक अधिकारों से वंचित करके नगरीय सभ्यता से बहिष्कृत कर दिया गया था | अशिक्षा के कारण विद्वान बौद्ध अपने वैभवशाली इतिहास को पूरी तरह भूल गये |
दूसरे यह कि मनुवादियों ने इनके इतिहास को पूरी तरह मिटाकर उसका मनुवादी करण कर दिया |
हजारों साल के बहिष्कृत जीवन के कारण इन बौद्धों को अपना इतिहास खोजने का कोई उपाय ही नहीं था | मनुवादी जो भी काल्पनिक मनगढ़न्त किस्से कहानियां कथा भागवत के जरिये से इन्हें बताते उसे ही सही मानना इनकी मजबूरी बन गयी थी |
तब इन मनुवादियों को नहीं पता था कि भारत में ज्योतिबा फूले, साहूजी महाराज, पेरियार रामासामी नायकर धरती पर अवतरित होंगे और ज्ञान के प्रतीक बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर जैसे महा विद्वान का जन्म हो सकता है जो सभी शूद्र गुलाम बहिष्कृत लोगों की गुलामी की बेड़ियां काटकर इनके मानवीय अधिकार वापस दिलवाकर इन्हें शिक्षित वैज्ञानिक व तर्कशील बना दे़ंगे |
अब बहुजन समाज पड़ा लिखा शिक्षित है | लेकिन उसके पास उसके पुरखों का कोई इतिहास नहीं है |
वह तो भला हो इन मनुवादियों का जिन्होंने दुर्भावना से ही सही पुरानी परंम्परायें तीज त्योहार कथा भागवत पाखंड के माध्यम से इतिहास पलटकर गपोण शंख की मिलावट करके आज तक जीवित रखा है |
अब बहुजन भाई अपनी शिक्षित तर्कपूर्ण वैज्ञानिक वुद्धि लगाकर इनके तीज त्योहारों की असलियत खोजने में लग चुका है | बहुजन समाज के अनेकों विद्वान खासकर बाबा साहब अपने इतिहास की खोज में विदेशों (श्रीलंका तिब्बत चाइना म्यांमार थाईलैंड जापान) में भी गये | वहाँ से भी अपना इतिहास खोजकर लाये | हजारों काल्पनिक गपोड़शंख की असलियत खोजी जा चुकी हैं | हजारों वाकी हैं |
अगर ये तीज त्योहार मनगढ़न्त कपोल कल्पित किस्से कहानियां न होते तो शायद बहुजनों का ध्यान कभी इस ओर जाता ही नहीं |
जैसे कि दक्षिण भारत में दीपावली की द्वितीया यानी भइया दौज के दिन सभी बहने थाल सजाकर हल्दी चावल चंदन का तिलक अपने भाइयों के माथे पर लगाती मीठा खिलाती और कहती हैं –
इड़ा पिड़ा जावे, राज बलीचा आवे |
(अला बला जाये, बली का राज आये)
यानी की सभी मुशीबतें दुख दर्द की दूर होवे और बली महाराज का सुखकारी राज फिर से आवे |
यह देखकर हमारी आज की पीढ़ी महाराज बली कौन हैं इनका इतिहास खोजने का साहस करती है | होली त्योहार पर नारी स्वरूपा होलिका को रात में ही क्यों जलाया जाता है ? गुड़ी पड़वा का त्योहार देखकर हमारे शिक्षित विद्वान सोचने और उसकी सच्चाई जानने को मजबूर होते हैं | नवरात्रि का महिषासुर वध से क्या सम्बन्ध है ? ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं जो हमें यदा कदा देखने को मिल ही जाते हैं | जिनकी सच्चाई ढूढ़ने में हमारे शिक्षित विद्वान भाई लगे हुये हैं |
सोचने वाली बात यह है कि मनुवादियों ने अगर ये सभी तीज त्योहार पूरी तरह समाप्त कर दिये होते तो शायद हमारे शिक्षित विद्वान भाई अपना इतिहास खोजने के लिये, ईश्वर की खोज करने वालों की तरह काले घुप्प अंधेरे कमरे में काली बिल्ली को ढूँढ़ रहे होते, खास कर जहाँ कभी किसी ने काली बिल्ली देखी ही नहीं हो |
हमारे देश में दूसरी शताब्दी ईस्वी से लेकर नौवीं शताब्दी ईस्वी तक के इतिहास को गुप्त काल या ऐतिहासिक तौर पर अंधकार युग कहा जा सकता है
| इस युग का इतिहास मनुवादियों द्वारा जानबूझकर मिटाया गया है |
आठ सौ साल के इतिहास में कोई गिने चुने एक दो राजा महाराजाओं जैसे समुद्रगुप्त विक्रमादित्य गुप्त या महाराज हर्षवर्धन आदि के अलावा किसी भी राजा महाराजा का कोई खास इतिहास हमारे देश में ढूँढ़ने से भी नहीं मिलता है | जबकि इतने बड़े देश के इस कार्य काल में कम से कम सौ या दो सौ राजा महाराओं का इतिहास तो होना ही चाहिए था |
इनकी जगह सैकड़ों मन गढ़न्त, विक्रम बैताल, बैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी , जिसमें सिंहासन की बत्तीस पुतलियों की कपोल कल्पित असंभव कहानियों को इतिहास के रूप में साहित्य में भी घुसेड़ रखा है |
इसलिए हम समझते हैं कि मनुवादियों ने बहुजन मूलनिवासी बौद्धों का सम्पूर्ण इतिहास घटनायें विरासतें आदि मिटा कर दफन कर दीं | लेकिन सभी घटनाओं का मनुवादी करण करके तीज त्योहारों के रूप में जीवित रखकर बहुजनों पर बहुत बड़ा उपकार किया है | हालाँकि मनुवादियों का मकसक मूल निवासी बहुजन भाइयों को मूर्ख बनाकर अंधविश्वास और पाखंड में धकेलना था |
हमारे बहुजन भाई इन तीज त्योहारों में पहले जैसी आस्था भले ही न रखें, लेकिन ये तीज त्योहार जीवित रहने चाहिये | ताकि हमारी आने वाली शिक्षित वैज्ञानिक पीढ़ियां इन त्योहारों की तार्किक वैज्ञानिक या पुरातात्विक खोज कर के जान सकें कि इन त्योहारों की हकीकत क्या है और यह कि मनुवादियों ने हमारे पूर्वजों को किस प्रकार बेवकूफ बना कर शोषण करके राज किया है |
आज 6 दिसम्बर बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर जी का महापरिनिर्वाण दिवस है | यह 69वाँ महापरिनिरवाण दिवस बाबा साहब के संविधान की बदौलत है | हमारे बहुजन भाईयों की अनपढ़ और पहली पीढ़ी अगर जागरूक न होती तो शायद बाबा साहब को भी मनुवादी लोग काल्पनिक सिद्ध कर देते | इसमें भी मान्यवर साहब कांसीराम जी के संघर्षों की बड़ी भूमिका रही है, जो उन्होंने बाबा साहब को पुनरुज्जीवित कर दिया |
वो थे – इसलिये हम हैं
बाबा साहब को श्रद्धांजलि देकर नमन करते हुए बाबा साहब की कही बात पर अमल करना न भूलें – –
1–शिक्षित बनो ( शैक्षिक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एवं जागरूक होकर नयी पुरानी तार्किक वैज्ञानिक खोजें करो ) |
2 — संगठित होओ ( एससी-एसटी ओबीसी मायनॉरिटी, सुशिक्षित होकर संगठित हों, इसका मतलब अलग अलग संगठन बनाना नहीं है ) |
3 — अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करो ( इसका मतलब सिर्फ लड़ाई लड़ना नहीं है | सत्ताधारी या सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना है ) |
आज बाबा साहब के करोड़ों अनुयायी हैं , सभी मिलकर बाबा साहब की बातों को मानने का प्रण लें और उनके पद चिन्हों पर चलें | बाबा साहब के लिये यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है |
जय भीम
लेखक
डी डी दिनकर (मैनेजर)
अध्यक्ष बीएसआई
चमन गंज फफूंद
जिला – औरैया यूपी 206247
9415771347

