मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
गुरवार 30 दिसम्बर, 1937 के दिन रात 10 बजे मद्रास मेल से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर बोरीबंदर स्टेशन से सोलापुर जिले के दौरे पर निकले।
सोलापुर जिला परिषद पंढरपुर में होनी थी। परिषद में हिस्सा लेने के लिए डॉ. बाबासाहेब तथा उनके साथ आने वाले अन्य लोग शुक्रवार दिनांक 31 दिसम्बर, 1937 के तड़के साढ़े पांच बजे के करीब कुर्जुवाड़ी स्टेशन में दाखिल हुए थे। स्टेशन पर परिषद के स्वागतध्यक्ष विधायक श्री जीवाप्पा ऐदाले डॉ. बाबासाहेब के स्वागत के लिए उपस्थित थे। उन्होंने तथा वहां उपस्थित अन्य लोगों ने डॉ. बाबासाहेब का प्रेमपूर्वक स्वागत कर उन्हें फूलमालाएं अर्पण कीं।
कुर्जुवाड़ी स्टेशन का प्लेटफार्म लोगों से उमड़ पड़ा था। इस स्टेशन के रेल अधिकारियों का बर्ताव लेकिन, गुस्सा दिलाने वाला था। दुख के साथ कहना पड़ेगा कि गरीब जनता का उत्साह और डॉ. बाबासाहेब की लोकप्रियता में दिनोंदिन आती बढ़ोत्तरी उनसे बर्दास्त नहीं हो रही थी। डॉक्टर साहब के दर्शन करने आए उत्साह के मारे लोग बिना टिकट प्लेटफार्म पर आ गए थे। उन सभी से उन्होंने दौंड स्टेशन से बनने वाले टिकट का दुगुना पैसा मांगा था, लेकिन वहां इक्ट्ठा हुए निर्धन लोग इतना पैसा कहां से लाएं? आखिर स्टेशन मास्टर की मध्यस्थता से यह मसला जैसे-तैसे ठंडा हुआ। और वहां अटके पड़े लोगों की छुट्टी हुई।
यहां जानबूझ कर इस प्रसंग का जिक्र छेड़ने के पीछे जो कारण है उसे हमारे अन्य लोगों को भी ध्यान में रखना है। अस्पृश्यों का आन्दोलन साधारणतः बहुजन समाज की आंखों में चुभता रहता है। इसीलिए किसी से भी, किसी भी तरह की छोटी-सी सहायता तक मिलने की उम्मीद बिना रखे उन्हें बरतना होगा। वरना अपमानकारी घटनाएं होंगी।
कुडुवाड़ी में डॉक्टर साहब के लिए स्पेशल गाड़ी की व्यवस्था की गई थी। अन्य मेहमान और स्वयंसेवकों के लिए एक स्पेशल बस रखी गई थी। ये दोनों गाड़ियां पौ फटने के आसपास पंढरपुर की राह पर चलीं। रास्ते में माढे तालुका के वातले गांव में गांववालों की ओर से डॉ. बाबासाहेब को और अन्य विधायकों को फूलमालाएं पहनाई गई।
आगे कर्कम गांव के पास गाडी आते ही गांव का अस्पृश्य समाज और स्वयंसेवक दल बाजे-गाजे के साथ डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के स्वागत के लिए उपस्थित हुए। सभी लोगों का वहां एक छोटा जुलूस ही बना। गांव में मातंग और महार समाज ने बाबासाहेब के स्वागत की तैयारी में मंडप बनाया था। कर्कम गांव से जुलूस निकल कर डॉ. साहब की मोटर और स्वयंसेवकों वाली बस बादलकोट फॉरेस्ट से बहती चंद्रभागा नदी के तीर वाली परती जमीनें देखने चले। गाड़ी में विधायक गायकवाड, ऐदाले, रोहम, सावंत और चित्रे आदि लोग थे। यह परती जमीन अस्पृश्य लोगों को रियायती दामों में मिले इसलिए विधायक ऐदाले सरकार में कोशिश कर रहे हैं। डॉ. बाबासाहेब प्रत्यक्ष रूप से जमीन देखें इसलिए श्री ऐदाले ने यह कार्यक्रम रखा था। परती जमीन तक पहुंचने के लिए 3 किमी. तक की पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। बाबासाहेब ने पैदल 3 किमी चल कर उस जगह को देखा। नदी के किनारे गांव वालों द्वारा लाया गया अल्पाहार ग्रहण किया और वह कर्कम गांव लौट आए। वहां महार समाज की ओर से खास तौर पर बनाए गए मंडप में उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया गया। उनसे दो शब्द कहने की विनति की गई। मातंग समाज द्वारा स्वागत के लिए जो मंडप बनाया है वहीं दो शब्द कहने की बात बता कर उन्होंने विधायक गायकवाड को दो शब्द बोलने की आज्ञा दी। तब भाऊसाहब गायकवाड ने संक्षेप में लेकिन समयोचित भाषण किया। उनके भाषण के बाद डॉ. बाबासाहेब ने वहां उपस्थित महिला एवं पुरुषों से स्वतंत्र लेबर पार्टी के सदस्य बनने के लिए कहा और उसके बाद वहां का कार्यक्रम समाप्त हुआ। उसके बाद सब लोग मातंग समाज द्वारा बनाए गए मंडप में चले गए। वहां महार एवं मातंग समाज द्वारा बनाए गए शामियाने में दाखिल हुए। वहां महार और मातंग समुदायों के लोग बड़ी संख्या में जुटे हुए थे।
वहां छोटा-सा भाषण देते हुए डॉ. बाबासाहेब ने कहा-
कल, यानी 1 जनवरी, 1938 को सोलापुर में मातंग समाज की एक परिषद होने वाली है। उस परिषद में मुझे आमंत्रित किया गया है। वहां मैं जिस विषय पर विस्तार से बोलने वाला हूं उसी विषय पर आज यहां मैं संक्षेप में बोलूंगा। यहां बोलने का उद्देश्य यह है कि आप में जैसे कुछ लोग उस परिषद में जाने वाले होंगे और कुछ लोग किन्हीं कारणवश वहां न जाने वाले भी होंगे। जो नहीं जाने वाले हैं उन्हें वहां किए जाने वाले भाषण का सार संक्षेप पता चले इसलिए आज मैं यहां अपनी बात बताने जा रहा हूं। पहली बात यह कि अस्पृश्यों में शामिल महार, चमार, भंगी आदि जो जातियां हैं उनमें एकता नहीं है यह हम सभी का दुर्भाग्य है। इस एक न होने का कारण हिन्दु समाज का जाति भेद ही है। जाति भेद के लिए महार, चमार, भंगी या मांग जिम्मेदार नहीं हैं। जातिभेद ऊपर से बह कर आई गटर गंगा है। हमारी तरफ बह कर आता नरक है। इसी कारण जाति भेद
के कड़वे फल और उनका बुरा असर हमें भुगतना पड़ रहा है। दुर्भाग्य की बात यह है कि हिन्दु लोग हमारा जाति भेद तो दूर करते ही नहीं हैं, उल्टे अस्पृश्यों के अज्ञान का फायदा लेते हुए उनके जाति भेदों का पक्का बनाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। मातंगों को महारों के खिलाफ भड़काते हैं। हममें अपनी भेदनीति फैलाना और हमारे बीच एका होने नहीं देना आदि वे करते हैं। जाति भेद फैलाने की जिम्मेदारी की जड़ भले हिन्दू धर्म में हो, हमें अपनी जिम्मेदारी नहीं भूलनी चाहिए। हम अगर अपनी जिम्मेदारी भुलाते हैं तो वह हमारे लिए आत्मघातक सिद्ध होगा। हमारा कर्त्तव्य है कि हम आपसी जाति-भेदों को नष्ट करें और हमारे बीच भेद-नीति को फैलने ना दें। हम जब तक इस लक्ष्य को साध्य नहीं कर लेते तब तक हमारा भाग्योदय संभव नहीं हो सकता। महार और मांगों के बीच की रोटी बंदी, बेटी बंदी खत्म होनी चाहिए। हर जाति अगर अपने बारे में शेखी बघारने के लिए केवल अपनी जाति से ही चिपकी रहेगी तो महार, महार ही रहेगा और मातंग, मातंग ही रहेगा और हम पर होने वाले अत्याचार का हम विरोध नहीं कर पाएंगे। महार या मांग नाम में ऐसा क्या रखा है जिसके बारे में गर्व महसूस किया जाए। इन नामों से कौन-सी उज्ज्वल परंपरा आपके सामने साकार होती है जिसे बनाए रखने के लिए आप जी-जान लगा दें? पूरा समाज इन नामों को तुच्छ मानता है। कूड़ेदान के कचरे जितनी भी आपकी कीमत नहीं है। सो, इस नाम के बारे में मन में अभिमान ना रखते हुए, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि दोनों समाज एक ही सिल पर पिस रहे हैं। इसीलिए दोनों को मिल-जुल कर साथ में रहना चाहिए। इस बारे में अगर महार समाज के बारे में बताना हो तो वे कोई जाति-भेद मानने के लिए तैयार नहीं हैं। मांग, चमार या भंगी लोगों के साथ रोटी या बेटी व्यवहार करने के लिए वे तैयार हैं। और अगर ये व्यवहार करने में महार हिचकिचा रहे हों तो उनसे ये बातें करवाने का जिम्मा मैं लेता हूं।
दूसरी बात जो मैं आपको बताना चाहता हूं वह यह है कि फिलहाल आपको काँग्रेस नामक, संस्था से दूर ही रहना होगा। इसके पीछे एक ही वजह है। वह यह कि काँग्रेस मायावी सृष्टि है। आप मुझे एक बात बताइए कि गांव का बनिया या साहूकार अपने सिर पर अगर चार आने की गांधी टोपी पहनेगा तो क्या उनकी सोच बदल जाएगी? अपने गरीब ग्राहकों से ब्याज उगाहे बगैर क्या वह रह पाएगा? आपकी गर्दन पर सवार होना वह छोड़ कैसे देगा? और आज काँग्रेस बता रही है कि वे बनियों का हित साधेगी। साहूकारों का भला करेगी। साथ में वह गरीबों की भी हितसाधना करेगी। बिल्ली और चूहे को वह एक जगह कैसे रखना चाहती है। बिल्ली के सामने चूहे को रख कर वे चूहे की जान कैसे बचाएंगे? यह सब आपको भी सोचना चाहिए। इसीलिए हमें अपनी ताकत बढ़ानी पड़ेगी। और ताकत बढ़ाना यानी आप ही के हित के लिए बनी स्वतंत्र लेबर पार्टी का सदस्य बनना। आज मैं आपसे बस इतना ही कहना चाहता हूं।
- जुल्म ढाने वालों का मुकाबला करने के लिए तैयार रहें!
31 दिसम्बर, 1937 को कर्कम से पंढरपुर की ओर जाते हुए मोटरगाड़ी में विधायक विभिन्न विषयों पर अपने अलौकिक नेता के विचारों की अमृतधारा का पान कर रहे थे। थोड़ी ही देर में यानी दोपहर 12 बजे के आसपास चंद्रभागा नदी के इस पार गाड़ी पहुंची। यहां महिलाएं और पुरुषों का अपार समुदाय इस मृत समाज में संजीवनी निर्माण करने वाले लोकोत्तर पुरुष का दर्शन करने के लिए पहुंचे थे। गाड़ी नजर आते ही जयकार की ध्वनि से वातावरण गूंजने लगा। दर्शनोत्सुक लोगों के झुंड दौड़ते हुए गाड़ी के आगे आने लगे। चंद्रभागा पर बने पुल के मुंहाने जब गाड़ी आई तब भीड़ इतनी उमड़ पड़ी थी कि गाड़ी को आगे निकलने के लिए रास्ता ही नहीं मिल रहा था।
संपादक महाराज, आपका संवाददाता कोई पंढरपुर का वारकरी नहीं है। वह पहली बार पंढरपुर आया है। हालांकि ‘पंढरपुर महिमा’ उसने सुन रखी है। उसने सुना था कि बिठोबा के दर्शन के लिए अनगिनत लोग पंढरपुर में प्रवेश करते हैं। लेकिन उसने यह नहीं सुना था कि किसी विभूति के दर्शनों के लिए पंढरपुर की जनता विट्ठत को भुला कर चंद्रभागा को लांघ कर पंढरपुर से बाहर भी निकलती है। एक समाज बिट्ठल के दर्शनों के लिए पंढरपुर में प्रवेश करता है तो दूसरा समाज विटठ्ल की महति पर आघात करने वाली विभूति के दर्शनों के लिए पंढरपुर से बाहर निकलता है। इस दृश्य के ही कारण आपके संवाददाता के मन में ख्याल आया कि धार्मिक भावनाओं से अंधा हुआ बहुजन समाज अपनी आंखों पर लगी काली पट्टी खोल कर हिंदमाता का भविष्य उज्ज्वल करेगा। जो हो, इस दृश्य से इतना भर साफ-साफ नजर आ रहा था कि स्पृश्य समाज जिस मार्ग पर चला जा रहा है उसकी ठीक विपरीत दिशा में अस्पृश्य माने गए समाज का आज का मार्ग है।
गाड़ी का आगे का रास्ता वर्दीधारी समता सैनिक दल की स्थानीय टुकड़ियों ने बनाया और गाडी पुल से आगे बढ़ने लगी। गाड़ी के दोनों तरफ लोगों की भीड़ थी। आगे स्वयंसेवक थे, पीछे अपार भीड़ इस प्रकार जुलूस आगे बढ़ने लगा। गाड़ी बेहद धीमे चल रही थी। इसमें तय समय पर अगले कार्यक्रम कर पाना मुश्किल हुआ। गाड़ी तेजी से चलती तो लोग भी साथ में दौड़ने लगते। इसी प्रकार चलते हुए जुलूस एक मोड़ पर आया। जुलूस से निकले बगैर आगे बढ़ना संभव नहीं था इसलिए गाड़ी को दूसरे रास्ते से निकाला गया। लोगों से सभास्थल पहुंचने के लिए कहा गया। बाबासाहेब डाकबंगले पर पहुंचे जहां उन्हें रुकना था। वहां भी कुछ लोग पहले से आकर बैठे हुए थे। बाबासाहेब के वहां पहुंचने के बाद और लोग आने लगे। कई लोग गांव वालों से दी जाने वाली परेशानियां बाबासाहेब को बता रहे थे। साहब के दर्शन कर, उनसे विदा लेते थे। खाना खाने के बाद दोपहर 3 बजे के आसपास सोलापुर जिला अस्पृश्य राजनीतिक परिषद में उपस्थित रहने के लिए डॉक्टर साहब अपने साथ के लोगों के साथ निकले। डॉक्टरसाहब से मिलने के लिए पंढरपुर म्युनिसिपल्लिटी के अध्यक्ष रा. ब. परिचारक आए थे। वह भी परिषद में उपस्थित रहने के लिए निकले। म्युनिसिपल सराय में परिषद होनी थी। वहां बाबासाहेब का आगमन हुआ तो वहां जुटे बड़े जनसमुदाय ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ और जयध्वनि के साथ उनका भरपुर स्वागत किया। तुरंत सभा के कामकाज की शुरूआत हुई।
पहले लड़कियों ने सुस्वर गायन किया।
उसके बाद स्वागतध्यक्ष में जीवाप्पा ऐदाले एमलए का भाषण हुआ। डॉ. बाबासाहेब से परिषद की अध्यक्षता स्वीकारने की विनती की गई। सूचना का समर्थन किए जाने के बाद बाबासाहेब ने अध्यक्ष स्थान स्वीकारा। इस अवसर पर उन्होंने जो भाषण दिया वह इस प्रकार था
असल में परिषद का अध्यक्षीय भाषण लिख कर लाना चाहिए था ताकि पढ़ कर आपको सुनाया जा सके लेकिन समयाभाव के कारण मैं ऐसा नहीं कर पाया। इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। सो, आज मैं बेकार में लंबा-चौड़ा भाषण नहीं देने वाला हूं। आज मैं मुख्यतः तीन विषयों पर बोलूंगा। (1) क्या हमें कभी हिन्दू समाज में समानता का दर्जा मिलेगा? (2) अपनी आर्थिक स्थितियों के बारे में यह सोचना है कि हमें संपत्ति का सही हिस्सा मिला है? (3), आत्मोन्नति के लिए आंदोलन करने पर हम पर जुल्म ढाए जाते हैं, उनका प्रतिकार करने के लिए हम कैसे समर्थ बनेंगे?
🗣️ हमने पहले सवाल पर पूरी तरह सोचा है और इसी सवाल के साथ धर्मांतरण का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है। मैं इस बारे में आज यहां विस्तार से नहीं बोलना चाहता। लेकिन आपको इस पंढरपुर में चोखोबा से खासतौर पर परिचित कराना है। मंगलवेढा में ‘कूस’ यानी गांव के लिए परकोटा बनाना था। इस काम के लिए पंढरपुर के महारों को बेगार पर रखा था। उनमें चोखोबा भी थे। काम चल ही रहा था। कि एक जगह दीवार गिर गई। उसके नीचे दब कर जो लोग मरे उनमें चोखोबा भी थे। बाद में चोखोबा की समाधि बनानी थी तो लोगों को चोखोबा की हड्डियां चाहिए थीं। वहां कई महार मरे थे इसलिए कई लोगों की हड्डियां वहां दबी थीं। उनमें से चोखोबा की हड्डियां कौन-सी हैं इसका पता लगा पाना मुश्किल था। तब लोग जाकर नामदेव से मिले। इस मामले में कोई उपाय सुझाने के लिए कहा। नामदेव ने कहा कि कई हड्डियों में से चोखोबा की हड्डियां ढूंढना मुश्किल काम नहीं है। क्योंकि चोखोबा की हड्डियां विठ्ठल का नाम पुकार रही होंगी। इसीलिए जिन हड्डियों से ‘विठ्ठल विठ्ठल’ की ध्वनि निकले वे चोखोबा की हड्डियां हैं ऐसा समझ कर उठा लें और उन पर समाधि बनाएं। अब हड्डियों से ध्वनि निकलने की बात को अगर हम छोड़ भी दें तो भी यह निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि उसकी बेजान हड्डियों से भी विठ्ठल का नाम गूंजे इतनी उनकी महती थी। ज्ञानदेव, सोपानदेव, मुक्ताबाई आदि संतों की मालिका में चोखोबा को स्थान प्राप्त हुआ। लेकिन वह विट्ठल के मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाए। उनकी समाधि भी मंदिर से दूर बनाई गई है। जिस वर्ग में चोखोबा का जन्म हुआ था इस वर्ग के साथ उनके जमाने में जैसा व्यवहार किया था ठीक उसी हीन प्रकार का व्यवहार आज भी उस वर्ग के साथ होता है। उसी नजरिए से आज भी हमें आंका जाता है। इसीलिए, मैं कहता हूं, क्यों हम उस धर्म से आस लगाएं जिस धर्म से चोखोबा ने आस लगाई थी और उपेक्षा के अलावा कुछ नहीं पाया था। उस धर्म में हमेशा ही हमें हीन माना जाएगा। इसीलिए हमें ऐसे धर्म से दूर ही रहना होगा।
🗣️ दूसरा मसला आर्थिक है यानी हमारे पेट पालने का मसला है। आज देश की सारी संपत्ति पर सफेदपोश वर्ग ने कब्जा कर रखा है। वह बड़े ठाठ से, ऐसोआराम में जी रहा है। और आपके पास भरपेट खाना नहीं है, शरीर ढकने के लिए वस्त्र नहीं। अभी एक औरत अपने बच्चे के लिए कपड़े खरीदने के लिए मुझसे दो आने मांग रही थी। उस महिला का जो हाल है वही हम सबका हाल है। इसका कारण – उनके हिस्से संपत्ति आई है और हमारे हिस्से दरिद्रता। संपत्ति का न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ। यह बंटवारा समान कैसे बनाया जाए यही आज का सवाल है। गांव के पास वाली परती जमीन हम लोगों को कसने के लिए चाहिए यह अपनी मांग हम सरकार के सामने रखते हैं तो उनकी यह दलील होती है कि वह जमीन उनके मवेशियों के चारे के लिए उन्हें चाहिए। इसलिए हमें ना दी जाए। उनकी ऐसी कोशिशों के कारण वे परती जमीनें भी हमें मिल नहीं पाती। मुख्यमंत्री सम्माननीय खेर से जब मेरी मुलाकात हुई थी तब मैंने उनसे पूछा कि गांववालों के मवेशियों से भी क्या हमारी जानें कम कीमत की हैं? सरकार क्या हम लोगों की ओर ध्यान देने के बजाय गांव के मवेशियों के खाने-पीने का प्रबंध करेगी? सरकार को पहले इंसानों की जान बचानी चाहिए। आपको बस इतना ही बताना चाहता हूं कि आपकी कीमत आज जानवरों से भी कम है। आज सब लोग सेठ-साहूकारों की मदद करते हैं। गरीबों का मसीहा कोई नहीं है। गरीब ही गरीब का मसीहा है। गरीबों
को अगर अपने हालात में सुधार लाना हो तो कानून बनाने की राजनीतिक सत्ता उन्हें हासिल करनी होगी। विधिमंडल में अगर वे निःस्वार्थी लोगों को नहीं भेजेंगे तो ठगे जाएंगे। इसीलिए विधिमंडल में हमें निःस्वार्थी लोगों को भेजना होगा। और इसके लिए हमें हमेशा संगठित रहना होगा। इसीलिए स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की गई है। आज काँग्रेस की सरकार कानून बनाती है। और काँग्रेस विश्वमित्र की मायावी दुनिया है। वहां जैसा कि मुक्तेश्वर ने वर्णन किया है चूहा बिल्ली का दूध पीता है, शेर और बकरी एक बिस्तर में सोते हैं, नेवला सांप को चूम रहा है आदि होता है। वहां सेठ-साहूकार कह रहे हैं कि वे रैयत का हित करेंगे। पूंजीपति कह रहे हैं। कि वे मजदूरों का कल्याण करेंगे। यह सब करना झूठ के ढोल पीटने जैसा है यह गरीबों को अलग से बताने की जरूरत नहीं है। सेठ, साहूकार हमारे हितशत्रु हैं। हमें इसका पैदाइशी ज्ञान है। काँग्रेस इसी तरह लोगों को झांसे देती रही है। इसीलिए मैं काँग्रेस में शामिल नहीं हुआ। इसीलिए मैं आपसे भी कहता हूं कि आप भी काँग्रेस से दूर रहिए।
आपके हित के कानून ले आना और उन्हें लाने के लिए संघर्ष करना मेरा कर्त्तव्य है। मैं आपको आश्वासन देता हूं कि मैं अपना कर्त्तव्य पूरा करूंगा। लेकिन आपको भी अपने कर्त्तव्य की पूर्ति करनी होगी। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं। आप जब तक अपना आंदोलन तेज नहीं करेंगे हमें सफलता नहीं मिलेगी। न हमारा जीवन सुखमय होगा।
🗣️ तीसरा मामला यह है कि, अपनी उन्नति की कोशिश करते हुए हम पर जो जुल्म होते हैं उनका निवारण हम कैसे करें? आप जानते हैं कि सारी दुनिया हमारे खिलाफ है। दुनिया का मुकाबला दो तरह से करना होगा। पहले हमें अपने मन से डर को हटाना होगा। जब-जब हम पर कोई जुल्म होगा तब जुल्म करने वाले का सामना करने के लिए बिना उठा भगाए तैयार होना पड़ेगा। वो होगा सो होगा, डरने की क्या बात है? आपके पास है क्या जिसे गंवाने का आपको डर होगा? आपको मौत से भी डरना नहीं चाहिए। आप इतने निडर बनेंगे तभी अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का विरोध कर पाएंगे। हममें से जो युवा लोग हैं उन्हें अपने पहनावे में भी बदलाव लाना होगा। धोती की जगह छोटी पैंट और बदन पर एक कुर्त्ता यानी स्काऊट जैसा पहनावा आपको करना होगा। 18 से 40 साल तक की उम्र के हर एक को इसी तरह की पोशाक पहननी चाहिए। इससे भी आपकी मानसिकता में बेहद बदलाव आएगा। इसके अलावा जुल्मों से रक्षा के लिए हमें एक फंड खड़ा करना होगा। जो राशि इक्ट्ठा होगी उससे कानूनी मदद और पीड़ितों का दुख निवारण किया जा सकता है।
मेरी बताई सभी बातें करने के लिए आपको तैयार रहना होगा। और मुझे यकीन है कि आप तैयार होंगे भी।
इसप्रकार बाबासाहेब का एक घंटे तक भाषण हुआ। चायपान के बाद उस दिन का कार्यक्रम पूरा हुआ।
भारत सरकार द्वारा प्रकाशित पुस्तक
- बाबा साहब डॉ आंबेडकर
खण्ड 39 पेज 58 से 65
🙏🙏🙏🙏🙏🅰️🅿️
:- ए पी सिंह निरिस्सरो
जय भीम जय भारत जय संविधान

