मूकनायक राजस्थान अजमेर तहसील टांटोटी नारायण लाल गोठवाल शोकली
मोदी-शाह ने राजस्थान में युवा नेताओं को तैयार कर जमीन खींच ली,टकराव लेने के कारण हुई किनारे
क्या वसुंधरा राजे को अब यह अहसास हो गया है कि राजस्थान की राजनीति में भाजपा को अब उनकी खास जरूरत नहीं है? क्या वसुंधरा राजे यह समझ चुकी है कि अब राजस्थान में भाजपा की मुख्यधारा की राजनीति में पहले की तरह बने रहना उनके लिए संभव नहीं है और क्या वसुंधरा राजे अब अपनी अहंकार और अकड़ को छोड़कर फिर भाजपा में सक्रिय होना चाहती है?
यह सवाल इसलिए,क्योंकि राइजिंग राजस्थान समिट के पहले दिन उन्होंने पहले हवाई अड्डे पर जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगवानी की और फिर समिट में भी काफी वक्त रही। जो वसुंधरा लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सक्रिय नहीं रही और पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री होने के बावजूद प्रचार में शामिल नहीं हुई, उनका एकाएक इस तरह सक्रिय होने से माना जा रहा है कि उन्हें अहसास हो गया है कि अब उन्हें ही भाजपा की जरूरत है, भाजपा को उनकी नहीं। जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने राजस्थान में पार्टी के युवा और नए नेताओं की फौज तैयार करके सत्ता की बागडोर उन्हें सौंपी हैं,उसे देखते हुए अब वसुंधरा की सत्ता और संगठन के खुले मैदान में वापसी नामुमकिन नहीं,तो मुश्किल जरूर है। भाजपा अब मोदी और अमित शाह नियंत्रित पार्टी हैं। वहां अब इन दोनों का ही डंका बजता है। पार्टी में उन्हें अपनी बात नहीं मानने वाले नेता पसंद नहीं है और ना ही ऐसे नेता,जो लोकप्रिय और उनके समकक्ष हो।
वसुंधरा ने तो मोदी से सीधा पंगा लिया था। पुष्पा झुकेगा नहीं के अंदाज में पहले वो लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण से पहले अपनी ताकत दिखाती रही। फिर प्रचार से दूरी बना ली। विधानसभा चुनाव में भाजपा के जीतने के बाद 50 से ज्यादा विधायक अपने घर पर जमा करके फिर सीएम पद पर दावेदारी दिखाई। लेकिन दोनों ही दांव नाकाम रहे। लोकसभा चुनाव में 25 में से 11 सीटें गंवाने के बाद उन्हें फिर वापसी की उम्मीद बंधी थी। लेकिन भाजपा ने उन्हें विधानसभा चुनाव में भाव नहीं दिया और सत्ता में आने के बाद पहली बार जीते भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाने की पर्ची भी उनसे खुलवाई। नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान जैसे नेताओं ने इसीलिए हालात से समझौता कर लिया और मोदी-शाह दोनों से टकराव नहीं लेकर सत्ता में हिस्सेदारी ले ली। शिवराज सिंह चौहान तो भाजपा को लगातार तीसरी बार मध्य प्रदेश में सत्ता मिलने के बावजूद मुख्यमंत्री नहीं बनाए गए । लेकिन शायद वसुंधरा राजे को यह गलतफहमी थी कि राजस्थान में भाजपा और वसुंधरा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
सत्ता में रहना और सत्ता से दूरी में उतना ही अंतर है जितना जमीन-आसमान में होता है। ये अंतर राजनीति और नेता के अंदाज को बदल देता है। वसुंधरा के सत्ता से दूर रहते हैं ,उनके समर्थक भी टूटने लगे। कई विधायक जो उनके कट्टर समर्थक थे, धीरे-धीरे उनसे दूरी बनाने लगे। सत्ता में हिस्सेदारी की लालसा और आलाकमान की नजरों में विरोधी खेमे में होने की छाप से बचने के लिए ऐसा होना जायज भी है। अभी तो मंत्रिमंडल का विस्तार होना है और कई राजनीतिक नियुक्तियां होनी है। जो राज्य और कैबिनेट मंत्री का दर्जा रखती है। ऐसे में हो सकता है वसुंधरा को अपने आसपास का यह खालीपन वापस सक्रिय होने पर मजबूर कर रहा हो। लेकिन इस बार उनकी भूमिका वो खुद नहीं,मोदी-शाह ही लिखेंगे। जो उन्हें स्वीकार करनी ही होगी।
फिर मोदी भी मुख्यमंत्री भजनलाल की तारीफ करके भविष्य के संकेत देकर गए हैं। उन्होंने कहा कि बहुत कम समय में भजनलाल शर्मा की टीम ने शानदार काम करके दिखाया है। वह जिस कुशलता और प्रतिबद्धता के साथ राज्य के विकास में जुटे हैं, वह तारीफ के काबिल है। खुद वसुधंरा ने भी इसके बाद मीडिया से बातचीत में सीएम की तारीफ की।जाहिर है मोदी का भरोसा भजनलाल में कायम है। इस भरोसे को बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री को भी कुछ ज्यादा करने की जरूरत नहीं है। उन्हें भी बस मोदी के भजन ही करने हैं,क्योंकि काम करने के लिए राजस्थान में मोदी की भरोसेमंद अफसरशाही है और ये अब हर कोई जानता और समझता है।

