मूकनायक
देश
“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”
आजादी से पहले भारत देश की महिलाओं पर शोषण अत्याचारों के कितने दुखदायी कठोर नियम प्रतिबंध लागू थे | शायद आज की सभी महिलाओं को मालूम भी नहीं होंगे | उन्हें तो यह भी नहीं मालूम होगा कि उनका असली उद्धारक कौन है ?
नारी शिक्षा पर प्रतिबंध, पिता या पति की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं, चाहे पिता के घर रहे या विधवा होकर पति के घर पर रहे पराधीन ही रहना है | मनुस्मृति अध्याय 5 श्लोक 151 –
बाल्ये पितुर्वशे
तिष्ठेत्पाणिग्राहस्य यौवने |
पुत्राणां भर्तरि प्रेते
न भजेत्स्त्री स्वतन्त्रताम ||
(स्त्री को बचपन में अपने पिता के अधीन, युवा होने पर हाथ ग्रहण करने वाले पति के अधीन तथा पति की मृत्यु के पश्चात पुत्र के अधीन रहना चाहिए) | स्त्री को किसी की हालत में स्वतंत्र नहीं छोड़ना चाहिये | जिन्होंने मनुस्मृति पढ़ी है उन्हें पता है कि मनुस्मृति में महिलाओं के साथ कितनी नाइंसाफी की गयी है |
बाल बिबाह 11 या 13 साल की कम उम्र में ही 25 साल से अधिक की उम्र के पुरुष से शादी होना | शुद्धिकरण प्रथा, नियोग प्रथा, सारे तीज त्योहार व्रत उपवास महिलाओं की जिम्मेदारी पर थोप दिये गये | पति के मर जाने पर सती प्रथा अथवा वैधव्य जीवन की कठोर यातनायें | सोचकर ही दिल द्रवित हो जाता है |
हमारे देश के कई महापुरुषों ने नारी प्रताणना के विरोध स्वरूप अनेकों प्रयास किये, जैसे राष्ट्रसंत ज्योतिबा फूले, विलियम वेंटिक, राजा राम मोहन राय आदि | लेकिन ये सब मिलकर भी नारी यानी महिलाओं का संपूर्ण उद्धार नहीं कर सके |
बाबा साहब
बाबा साहब ने नारी उद्धार का संपूर्ण बीड़ा उठाया | पहले तो संविधान के आर्टिकल 15 के द्वारा लिंग भेद पर आधारित महिलाओं के शोषण सम्बन्धी सभी उपबन्धों को समाप्त किया | महिलाओं को पुरुष की बराबरी का अधिकार दिया | अन्य अधिकारों के लिये जब बाबा साहब ने हिन्दू कोडबिल लिखने की बात कही तो हिन्दू वादी नेताओं ने उनका खुलकर विरोध किया | तब वह कानून मंत्री थे | सभी नेताओं के विरोध के चलते उन्हें कानून मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा लेकिन उन्होंने हिन्दू कोडबिल लिख ही दिया | जिसे संशोधन का नाम देकर बाद में लागू किया गया | हिन्दू कोडबिल के विरोध का एक प्रसंग निम्न प्रकार है – –
जब बाबा साहेब हिन्दूकोडबिल तैयार कर रहे थे तब बनारस के सबसे बड़े धर्मगुरु करपात्री महाराज ने बाबा साहेब को बहस करने की चुनौती दे डाली।
उस महाराज ने कहा डॉ अम्बेडकर एक अछूत है,
वे क्या जानते हैं हमारे धर्म के बारे मे,
हमारे ग्रन्थ और शास्त्रों के बारे में,
उन्हें कहाँ संस्कृत और संस्कृति का ज्ञान है?
यदि उन्होंने हमारी संस्कृति से खिलवाड़ किया तो उन्हें इसके परिणाम भुगतने होंगे।
शायद करपात्री महाराज को दंभ यह था कि डा. बी आर अंबेडकर अछूत हैं और अछूत होने के नाते वह संस्कृत का तो एक शब्द भी नहीं जानते होंगे | उनके लिए तो भारत में संस्कृत सीखने के दरवाजे ही बंद हैं | लेकिन बाबा साहब तो बाबा साहब ठहरे उन्होंने जर्मनी जाकर संस्कृत का अध्ययन करके संस्कृत में महारत हासिल कर ली थी | जब संस्कृत में विद्वता हासिल कर ली तो उन्होंने मनुवादी ग्रन्थ पुराण मनुस्मृति आदि सभी का गम्भीर अध्ययन कर लिया था |
करपात्री महाराज ने बाबा साहेब को इस पर बहस करने हेतु पत्र लिखा और निमंत्रण भी भेज दिया।
बाबा साहेब बहुत शांत और शालीन स्वभाव के व्यक्ति थे,
उन्होंने आदर सहित करपात्री महाराज को पत्र लिखकर उनका निमंत्रण स्वीकार किया और कहा कि हिंदीइंग्लिशसंस्कृतमराठीया_अन्य किसी भी भाषा मे,
मैं आपसे शास्त्रार्थ करने को तैयार हूं।
आपके मन मे यदि कोई प्रश्न है तो आप अपने समयानुसार आकर अपनी जिज्ञासा पूरी कर सकते हैं।
यह पढ़ते ही करपात्री महाराज आग बबूला हो गए,
और वापस बाबा साहेब को पत्र लिखा कि डॉ अम्बेडकर आप शायद भूल रहे हैं
कि आप एक साधू, सन्यासी को अपने स्थान पर बुला रहे हैं आपको यहां आकर बात करनी चाहिए
न कि एक साधू आपके पास आकर बात करें।
बाबा साहेब ने उसी रूप में जवाब देते हुए कहा,
मैं साधू, सन्तों का सम्मान करता हूँ।
उनके तप और त्याग का आदर करता हूँ
लेकिन फिलहाल जिनसे मैं पत्राचार कर रहा हूँ वे साधु कहाँ रहे हैं?
वे राजनेता हो गए हैं वरना एक बिल से किसी साधू को क्या लेना देना हो सकता है?
एक ऐसा बिल जिसमे महिलाओं को भी सम्पत्ति रखने का अधिकार मिले, तलाक और विधवा विवाह का अधिकार मिले?
इसमे मुझे तो कोई बुराई नजर नही आती,
इसलिए मेरी नजर में आप राजनीति कर रहे हैं और राजनीतिक लिहाज से आप शायद भूल रहे हैं
कि मैं वर्तमान समय मे भारत का कानून मंत्री हूँ और एक मंत्री के रूप में,
मैं ऐसी किसी जगह नही जा सकता हूँ जहां जनता का हित न हो या लोकतंत्र का अपमान हो।
यह पढ़कर करपात्री महाराज अचंभित हुए और बाबा साहेब को पुनः एक और पत्र लिखा,
जिसमे वे बाबा साहेब से मिलने को राजी हुए लेकिन कभी मिलने नही आये । जाति से अपने को ऊंचा मानते थे करपात्री ।
ऐसे थे बाबा साहेब और
एक आज के नेता हैं जिन्हें हमको नेता कहते हुए भी शर्मिंदगी महसूस होती है।
जब तक धर्म और राजनीति दोनों को अलग अलग न किया जाएगा,
तब तक इस देश का कुछ भला नही हो सकता है यह अटल सत्य है।
बाबा साहब ने किसी खास जाति वर्ग संप्रदाय की महिलाओं का ही हित नहीं किया | उन्होंने तो संपूर्ण वर्ग की महिलाओं का उद्धार किया है |
आज जो भी महिलायें शिक्षित जागरूक नौकरी पेशा या किसी सम्पत्ति की मालकिन हैं | वह किसी भी जाति वर्ग संप्रदाय की हैं उनसे निवेदन है कि सुबह-सुबह उठकर एक बार बाबा साहब के अहसानों को याद करके उन्हें नमन करते हुए कम से कम उनके चित्र पर एक फूल चढ़ाकर श्रद्धा सुमन जरूर अर्पित किया करें |
जय भीम
लेखक:
देवी दयाल दिनकर (मैनेजर)
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला- औरैया ( उप्र ) 206247
9415771347

